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यहाँ पर श्रीमद्भगवद्गीता के सभी 18 अध्यायों की सूची दी गई है। प्रत्येक अध्याय पर क्लिक करके आप उसका सार एवं श्लोक देख सकते हैं।
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जीवन में भ्रम का समाधान: भगवद्गीता की प्रेरणा किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥ अर्थ: कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषय में विद्वान भी भ्रमित हो जाते हैं। मैं तुम्हें कर्म का स्वरूप समझाऊंगा, जिसे जानकर तुम अशुभ (भ्रम और बंधन) से मुक्त हो जाओगे। जीवन का महत्वपूर्ण…
Mahabharat whole story in short महाभारत की संक्षिप्त कहानी, पात्र और दर्शन महाभारत क्या है? महाभारत विश्व का सबसे लंबा महाकाव्य और हिंदू धर्म का एक प्रमुख ग्रंथ है, जिसे स्मृति वर्ग में रखा जाता है। यह भारत का धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक, और दार्शनिक ग्रंथ है, जिसमें लगभग एक लाख श्लोक हैं। इसे महर्षि वेद…
श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय २: सांख्य योग यहाँ भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के सभी ७२ श्लोक संस्कृत में और उनके अर्थ हिंदी में प्रस्तुत किए गए हैं। श्लोक १ संजय उवाच:दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥ संजय ने कहा: उस समय पाण्डवों की सेना को व्यूहरचित देखकर राजा दुर्योधन अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास…
भगवद्गीता पर 10 महान व्यक्तियों की व्याख्या GeetaNiti.in पर आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भगवद्गीता सनातन धर्म का सार है जिसे विभिन्न संतों, चिंतकों और योगियों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से समझाया है। प्रस्तुत है 10 प्रमुख व्याख्याएं: 1. आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक शंकराचार्य ने गीता को आत्मा और ब्रह्म के एकत्व…
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5: कर्म संन्यास योग – सभी श्लोक और हिंदी अर्थ श्रीमद्भगवद्गीता हिंदू धर्म का एक पवित्र ग्रंथ है, जो जीवन के गहरे दर्शन और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। इसका पांचवां अध्याय – कर्म संन्यास योग कर्म और संन्यास के बीच संतुलन की शिक्षा देता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को…
श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1अर्जुन विषाद योग कुल श्लोक: 47 | अर्थ सहित श्लोक 1 धृतराष्ट्र उवाच |धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥1॥ अर्थ: धृतराष्ट्र बोले – हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्रित हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? श्लोक 2 सञ्जय उवाच |दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं…