Sakat Chauth Vrat Katha in Hindi – Complete 4 Stories for Puja

सकट चौथ व्रत कथा (Sakat Chauth Vrat Katha in Hindi)– चारों पूज्य कथाएँ

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सकट चौथ का दिन हर माँ के लिए बड़ा ही भावुक और पावन माना जाता है। इस दिन सुहागिनें अपने लाल की लंबी उम्र, सुख और संकट निवारण के लिए सकट माता का व्रत रखती हैं। शाम को चाँद निकलने पर अर्घ्य दिया जाता है और सकट चौथ व्रत कथा(Sakat Chauth Vrat Katha in Hindi) श्रद्धा से सुनी‑सुनाई जाती है।

यहाँ पर सकट चौथ की चारों प्रमुख कथाएँ देसी लोकभाषा में दी जा रही हैं, ताकि आप इन्हें अपने घर में, पूजा के समय, पूरे भाव से पढ़‑सुना सकें। भाषा एकदम सादी, घरों में बोली जाने वाली, और कथा पूरी लंबाई में रखी गई है।

सकट चौथ की पहली व्रत कथा – सच्ची गरीबी पर सकट माता की कृपा

एक गाँव में दो भौजाइयाँ रहती थीं – एक जेठानी, एक देवरानी। जेठानी के घर में रुपया‑पैसा, अन्न‑धन, बच्चे‑कुच्चे, सब कुछ भरपूर था। देवरानी के हिस्से में बस एक छोटी‑सी झोंपड़ी, फूटा घड़ा और टूटी चारपाई आई थी। पेट पालने के लिए वह रोज सुबह‑सुबह जेठानी के घर पहुँच जाती, झाड़ू‑पोंछा, गोठ‑बथान, बर्तन‑बरतन, सब काम करके जो थोड़ा‑बहुत चूनी‑चोकर मिलता, वही ले जाकर अपने घर में पकाती और खा लेती।

साल भर घिस‑घिस कर वह ऐसे ही गुज़ारा कर रही थी। माघ महीने का पावन सकट चौथ आया। हर घर में चहल‑पहल, पूजन की तैयारी, लड्डू‑पूड़ी, हलुआ‑पुरी बन रहे थे। देवरानी ने भी व्रत तो रखा, पर घर में न अनाज था, न घी, न शक्कर। दिन भर वो जेठानी की ही सेवा‑टहल में लगी रही। सारे दिन भूखी‑प्यासी रहकर भी उसने एक बार नहीं कहा कि मुझे भी थोड़ा दे दो, आज मेरा भी व्रत है।

रात को जब वह लौटने लगी, तो सोचा – आज तो जेठानी व्रत कर रही है, इतना पकवान बना है, आज तो थोड़ा सामान दे ही देगी। पर उस रात जेठानी ने तो जैसे और भी कंजूसी का ताला लगा लिया। न चूनी दी, न चोकर, न एक मुट्ठी आटा। देवरानी चुपचाप खाली हाथ अपनी झोपड़ी में वापस आ गई।

घर आकर उसने सोचा – “भूखी रह जाऊँगी, पर व्रत तो टूटेगा नहीं।” वह धीरे से खेत की मेड़ पर गई, वहाँ जो बथुआ उगा था, उसे तोड़ लाई। झोंपड़ी के कोने‑कोने में हाथ डालकर, कन‑कन करके दो‑चार दाने चावल के ढूँढ़े, थोड़ा इकट्ठा किया और छोटे‑छोटे कन के लड्डू बना लिए। बथुआ की भाजी भी सादा‑सा बनाकर रख दी। यही उसका आज का प्रसाद था।

रात गहरा गई। देवरानी ने मन ही मन सकट माता को प्रणाम किया, “माता, जो है सो यही है, आप ही स्वीकार करना।” तभी आधी रात के आसपास उसकी झोंपड़ी की टटिया (झरोखा) के पास से आवाज आई –


“ब्राह्मणी, किवाड़ खोल, बहुत भूख लगी है।”

देवरानी बोली – “माता, मेरे घर में कहाँ किवाड़, कहाँ दरवाजा, आप तो बस टटिया सरका कर अंदर आ जाओ।” थोड़ी देर में साक्षात सकट माता उसके घर के अंदर थीं। माता ने कहा – “बेटी, कुछ खाने को है? बहुत भूख लगी है।”

देवरानी ने लजाते हुए कहा – “माता, गरीब की झोंपड़ी, आपका क्या सत्कार करूँ? जो थोड़ा‑बहुत है, वही प्रेम से बनाकर रखा है, आपकी दया हो तो स्वीकार कीजिए।” उसने सामने कन के सूखे‑सूखे लड्डू और बथुआ की भाजी रख दी, साथ में टूटी कटोरी में फूटा‑सा घड़ा उठाकर पानी भी दे दिया।

सकट माता ने बड़े प्रेम से सारा प्रसाद खाया, पानी पिया और बोलीं – “बेटी, अब नींद आ रही है, सोने को कुछ है?” देवरानी ने हँसकर कहा – “माता, टूटी‑फूटी जो खाट है, वही तो मेरी भी शय्या है, आप उसी पर विश्राम कर लीजिए।”

माता खाट पर लेट गईं। थोड़ी देर बाद उन्हें शौच की हाजत लगी। उन्होंने पूछा – “बेटी, टट्टी कहाँ जाऊँ? घर साफ‑सुथरा पड़ा है।” देवरानी बोली – “माता, मेरा घर आपका है, दीवार हो या आँगन, जहाँ आपका मन करे, आप बैठ जाइए। मेरा घर तो आपसे ही पवित्र होगा।”

सकट माता ने पहले तो एक कोने में शौच किया, फिर दूसरे कोने में, फिर तीसरे में। पूरा घर मानो मैला हो गया। फिर भी माता बोलीं – “अभी भी निपटान पूरा नहीं हुआ, अब कहाँ जाऊँ?” देवरानी ने folded हाथ जोड़े और आँखों में पानी भरकर बोली – “माता, आप मेरे सिर पर कर दीजिए, यह भी आपका ही है।”

माता ने उसके सिर से पाँव तक शौच से लिपट दिया और बिना कुछ कहे वहाँ से चली गईं। रात बीती, देवरानी थकान में गहरी नींद सो गई।

जब प्रातः भोर हुआ, सूरज की किरणें झोंपड़ी में ढलीं, तो देवरानी की आँख खुली। जो दृश्य उसने देखा, वह चकित हो गई। जहाँ‑जहाँ रात में मैल था, वहाँ‑वहाँ अब शुद्ध सोना चमक रहा था। उसकी टूटी चारपाई पर सोने की पत्तियाँ, फूटे घड़े की जगह सोने का घड़ा, मिट्टी की झोंपड़ी की दीवारें कंचनमयी हो चुकी थीं। फर्श पर, चौखट पर, कोने‑कोने में सोना ही सोना बिखरा पड़ा था।

देवरानी ने रो‑रोकर सकट माता को याद किया, “माता, ये सब आपकी ही कृपा है।” वह जल्दी‑जल्दी सोना समेटने लगी, पर जितना उठाती, उतना और फैलता जाता। उसके हाथ थक गए, पर सोने की धारा कम न हुई।

उधर जेठानी सुबह‑सुबह इंतज़ार करती रही – “आज ये देवरानी आई क्यों नहीं? काम पड़ा है, बरतन पड़े हैं, गोबर पड़ा है।” गुस्से में अपने लड़के को बोली – “जा, देख, कहाँ मर गई, अभी तक आई नहीं।” लड़का जब देवरानी की झोंपड़ी के पास पहुँचा, तो आँखें फटी की फटी रह गईं।

वह दौड़ता हुआ माँ के पास आया – “अम्मा, देवरानी के घर तो चारो तरफ सोना ही सोना चमक रहा है!” यह सुनकर जेठानी के होश उड़ गए। वह भागती‑भागती वहाँ पहुँची। सामने का नज़ारा देखकर उसके मुँह से खुद निकल पड़ा – “ये किसको घूँसा मारा, किसको मूसा?” (किसको मारा, किससे लड़ाई की, जो ये दौलत आई?)

देवरानी ने सरल मन से कहा – “न मैंने किसी को घूँसा मारा, न मूसा। यह तो सकट माता की असीम कृपा है।” जेठानी ने लालच भरी आँखों से पूछा – “ऐसी कौन‑सी सेवा की तूने, जो माता ने तुझ पर इतनी मेहर बरसा दी?” देवरानी ने एक‑एक बात सच‑सच बता दी – कैसे कन के लड्डू बनाए, बथुआ की भाजी बनाई, फूटी गगरी में पानी दिया, टूटी खाट पर सुलाया और घर‑आँगन, यहाँ तक कि सिर पर भी शौच करवाया, पर मन में ज़रा भी घृणा नहीं की।

जेठानी के मन में लालच जाग उठा। उसने सोचा – “अगर मैं भी ऐसे ही कर लूँ, तो मेरे पास तो पहले से धन है, अब तो और सोना भर जाएगा।” उसने निश्चय कर लिया कि वह भी अगले साल सकट माता को ऐसे ही प्रसन्न करेगी, पर अंदर से उसने गरीबी केवल ओढ़ी, जानी नहीं।

साल बीता, फिर से सकट चौथ का दिन आया। जेठानी ने जानबूझकर अपने अच्छे बर्तन, सुहाग का साज‑सामान, अनाज सब छुपा दिया। दिखावे के लिए फूटा घड़ा बाहर रख दिया, टूटी चारपाई बिछा दी, बथुआ और कन के लड्डू वैसा ही बनाकर रख दिए। मन में सोच रही थी – “आज तो मेरा घर भी सोने से भर जाएगा।”

रात को सचमुच सकट माता आईं। जेठानी ने भी देवरानी की तरह आवाज दी – “माता, किवाड़ कहाँ, टटिया खोल के आ जाओ।” माता अंदर आईं, जेठानी ने भी वही‑वही शब्द बोले – “जो थोड़ा‑बहुत है, वही खाइए, आपकी ही दया है।” कन के लड्डू और बथुआ का सादा खाना आगे रख दिया, फूटे घड़े से पानी दिया, टूटी खाट पर सुला दिया।

आधी रात को सकट माता को फिर शौच की हाजत हुई। उन्होंने पूछा – “कहाँ जाऊँ?” जेठानी, सब याद करके बोली – “माता, सारा घर लीपा‑पुता है, आपका है, जहाँ चाहो बैठ जाओ।” माता ने ठीक वैसा ही किया जैसा पिछले वर्ष किया था। घर के हर कोने में, दीवारों पर, फर्श पर, यहाँ तक कि जेठानी पर भी शौच कर दी, उसे सिर से पैर तक मैल में भिगो दिया और चली गईं।

सुबह हुई तो घर में भारी बदबू, चारों तरफ गंदगी, बच्चे‑बड़े सब घिन से दूर भागने लगे। जेठानी खुद भी गंदगी में लथपथ थी, चलना मुश्किल हो रहा था। सबने झुंझलाकर पूछा – “ये तुमने घर का क्या हाल कर दिया? कैसी पूजा की तुमने?”

जेठानी को समझ न आए, वह गुस्से में देवरानी के पास पहुँची – “तूने जो कहा था, मैंने वैसा ही किया, पर मेरे घर तो सोना क्या आता, गंदगी ही गंदगी भर गई!”

देवरानी ने शांत मन से कहा – “बहन, मैं तो सच में गरीब थी, मेरे पास देने को कुछ नहीं था, बस सच्चे मन से जो था, वही माता को अर्पण कर दिया। मेरा दुःख, मेरी लाचारी देखकर माता का हृदय पिघल गया, तब मुझे सोना मिला। तुमने तो गरीबी का बस नकाब पहना, असल में तुम्हारे घर में सब कुछ भरा पड़ा था। जहाँ चालाकी, नाटक और बनावटीपन हो, वहाँ माता का आशीर्वाद नहीं, बस सबक मिलता है।”

इस तरह पहली सकट चौथ की कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा और सचाई के आगे सकट माता खुद झुक जाती हैं, पर नकली गरीबी और लालच से केवल अपमान और दुख ही हाथ लगता है।

सकट चौथ की दूसरी व्रत कथा – बुढ़िया का इकलौता बेटा और आंवा

एक नगर में एक गरीब कुम्हार रहता था। उसका काम ही मिट्टी के बर्तन बनाना और उन्हें आंवा (भट्ठी) में पकाना था। कुछ दिनों से उसकी बड़ी मुसीबत हो गई – वह कितनी ही मेहनत से बर्तन बनाता, पर आंवा था कि किसी हाल में पकता ही नहीं था। आधा कच्चा, आधा पक्का रह जाता, सारा माल खराब हो जाता, घर में भूखों मरने की नौबत आ गई।

लाचार होकर एक दिन कुम्हार राजा के दरबार पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला – “महाराज, न जाने मेरे आंवे को क्या हो गया है, लाख कोशिश करूँ, फिर भी बर्तन पक्के नहीं हो रहे। आप मेरी कुछ सहायता कीजिए, नहीं तो हम सब भूखे मर जाएँगे।”

राजा ने अपने राजपंडित को बुलाया और समस्या बताई। पंडित ने थोड़ा औपचारिक ध्यान‑मनन करके कहा – “महाराज, आंवा तभी पकेगा जब हर बार आंवा लगाने से पहले उसमें किसी निश्छल बच्चे की बलि दी जाए। यही इसका एकमात्र उपाय है।”

राजा ने बिना गहराई से सोचे, पंडित की बात मान ली और हुक्म जारी कर दिया – “नगर के हर घर से बारी‑बारी से एक‑एक बालक की बलि दी जाएगी, जिससे राज्य का यह संकट टले।” राजाज्ञा भारी थी, कोई विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। मजबूरी में परिवार‑परिवार अपनी संतान में से एक बच्चे को बलि के लिए भेजने लगा।

धीरे‑धीरे बारी‑बारी कई घरों के फूल‑से बच्चे इस क्रूर प्रथा की भेंट चढ़ गए। नगर में माताओं के कलेजे चीख‑चीख कर रोते रहे, पर कोई सुनने वाला न था।

कुछ समय बीता, एक दिन माघ मास की सकट चौथ आई। उसी दिन की बलि की बारी एक बूढ़ी, दर‑दर की मार खायी बुढ़िया के इकलौते बेटे के नाम निकली। बुढ़िया के जीवन का बस वही सहारा था। उसके अलावा न कोई और संतान, न सहारा। खबर सुनते ही वह जमीन पर गिर पड़ी, रो‑रोकर बोली – “हे भगवान, मेरे बुढ़ापे का अकल्ला सहारा भी मुझसे छीनोगे?”

पर राजा का हुक्म टल नहीं सकता था। आँसू पोंछते‑पोंछते वह बेटे के पास गई, काँपते हाथों से उसे सकट की सुपारी और दूब का बीड़ा दिया और भर्राई आवाज में बोली –


“बेटा, तू भगवान का नाम लेकर आंवे में बैठ जाना। आज सकट चौथ है, सकट माता तेरी रक्षा जरूर करेंगी। मैं यहाँ बैठकर दिन‑भर उनकी पूजा करूँगी, तू वहाँ माता को याद करना, वे संकट अवश्य टालेंगी।”

बुढ़िया के कलेजे पर पत्थर रखकर, बेटे को आंवे में बैठा दिया गया। आंवा जला दिया गया। बुढ़िया घर आकर सकट माता की मूर्ति के सामने बैठ गई। न उसके पास घी था, न मिठाई, न फूल‑माला; उसने बस आँसुओं से भिगोई हुई दूब, सुपारी और अपनी सच्ची पुकार माता को अर्पण कर दी।

वह बुदबुदाती रही –


“तिल‑तिल सकट मनाऊँ, और सकट की रात,
महतारी‑पूत बिछुड़न, कबहुँ न होय।”

इधर आंवे में आग सुलग रही थी, उधर बुढ़िया का हृदय तिल‑तिल जल रहा था। पहले जहाँ आंवा कई‑कई दिन जलता, फिर भी कच्चा रह जाता था, इस बार आश्चर्य हुआ – रात भर में ही आंवा ठंडा पड़ने लगा, मानो भीतर से किसी अनदेखी शक्ति ने उसे ठीक से पका दिया हो।

सुबह होते ही कुम्हार दौड़ता हुआ आंवे के पास पहुँचा। अंदर झाँक कर देखा तो दंग रह गया – सारे बर्तन एकदम ठीक से पके हुए, सुनहरे चमकदार, कहीं हल्की दरार भी नहीं। उसने मन ही मन सकट माता को धन्यवाद दिया और डरते‑डरते उस जगह नज़र डाली, जहाँ बालक बैठाया गया था।

जो दृश्य दिखा, उससे उसकी आँखों से भी आँसू निकल पड़े – बुढ़िया का बेटा पूरी तरह सुरक्षित बैठा था, तनिक भी झुलसा नहीं, उसके आसपास और जो बच्चे पहले बलि के नाम पर दिए गए थे, वे भी सकुशल बैठे मुस्कुरा रहे थे, मानो कोई बुरा स्वप्न टूट गया हो।

बात जंगल की आग की तरह पूरे नगर में फैल गई। सबने देखा कि जिन बच्चों को वे खो चुके समझकर रो रहे थे, सकट माता ने सबकी जान लौटा दी। लोग समझ गए कि निरपराध बच्चों की बलि जैसी क्रूर बात कभी धर्म नहीं हो सकती, यह तो केवल पाप है।

राजा को भी अपनी भूल पर पछतावा हुआ, उसने तुरंत यह कुप्रथा बंद करवाई और सकट माता के मंदिर में जाकर क्षमा माँगी। नगरवासियों ने तब से संकल्प लिया कि सकट के दिन वे सच्चे मन से व्रत और पूजा करेंगे, कभी किसी बेगुनाह के प्राण की बात भी नहीं सोचेंगे।

तब से आज तक सुनते आए हैं कि जो माँ संकट चौथ का व्रत दृढ़ आस्था से करती है, सकट माता उसके बालक की उम्र बढ़ाती हैं, उसके चारो ओर दुर्घटनाओं और आघातों की अग्नि को ठंडा कर देती हैं।

सकट चौथ की तीसरी व्रत कथा – गरीब ब्राह्मण, सच बोलता बेटा और राजा की दया

एक गाँव में एक गरीब ब्राह्मण दंपति रहते थे। उनका एक ही बेटा था, जो घर का सहारा था। ब्राह्मण के पास इतनी आमदनी नहीं थी कि घर का खर्च आराम से चल सके, तो उनका बेटा पास के राजा के यहाँ छोटी‑मोटी नौकरी करता था। मेहनत बहुत, मजदूरी कम। दिन भर खटने के बाद भी घर में आलू‑नमक से आगे का इंतजाम बड़ी मुश्किल से हो पाता था।

इसी बीच माघ महीने की संकट चौथ आ गई। ब्राह्मणी का मन तो बहुत हुआ कि वह भी दूसरी औरतों की तरह व्रत रखे, पूजा करे, लेकिन घर में न तिल थे, न गुड़, न पूजा का सामान। फिर भी उसने निश्चय किया – “जो होगा देखा जाएगा, व्रत तो मैं रखूँगी ही, माता भूखे के भी भूख समझती हैं।”

सुबह‑सुबह उसने अपने बेटे को काम पर भेजते समय कहा – “बेटा, जब आज काम से लौटो, तो राजा के भंडार से थोड़ा‑सा तिल और गुड़ ले आना। मैं उनसे मांगने जाऊँ तो लज्जा आती है, तू चुपके से थोड़ा ले आना, ताकि मैं संकट माता की पूजा कर सकूँ। पर ध्यान रखना, चोरी का पाप बहुत भारी होता है, तो केवल उतना ही लेना, जितने से पूजा हो जाए, लालच मत करना।”

लड़का दिन भर राजा के यहाँ काम करता रहा। शाम होने पर जब वह महल के बड़े भंडारघर के पास से निकला, तो उसे माँ की बात याद आई। उसने धीरे से अंदर घुसकर दरवाजा भीतर से बंद कर लिया। चारों तरफ निगाह डाली – अनाज के पहाड़, गुड़ की टिकिया, घी के घड़े, तिल के बोरे, हर ओर माल ही माल था।

उसने हाथ आगे बढ़ाया, फिर खुद ही रोक लिया। उसके मन में उधेड़बुन चलने लगी – “माघ का महीना है, माँ की पूजा के लिए तिल और गुड़ तो चाहिए, पर चोरी करूँ तो पाप। तिल चुराऊँ तो भी पाप, गुड़ चुराऊँ तो भी पाप।”

वह खाली भंडार में खुद से ही बोलता रहा –


“तिल चुराऊँ, तो पाप,
गुड़ चुराऊँ, तो पाप,
माघ का महीना, क्या चुराऊँ?”

इसी बीच महल के पहरेदारों ने भीतर से यह धीमी‑धीमी आवाज सुनी। उन्हें शक हुआ कि भंडार में कोई चोर घुस आया है। वे भागकर राजा के पास पहुँचे और सारी बात बताई। राजा स्वयं कुछ सिपाहियों के साथ भंडार के दरवाजे तक आए और जोर से बोले – “कौन है अंदर? दरवाजा खोलो!”

घबराया हुआ लड़का भीतर से बोला – “महाराज, मैं ही हूँ, आपका नौकर। दरवाजा मत तुड़वाइए, मैं खुद खोलता हूँ।” उसने दरवाजा खोला, हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

राजा ने कड़ककर पूछा – “रात के समय भंडार में घुसकर क्या कर रहा था? तेरे मुँह से हमने तिल चुराने और गुड़ चुराने की बात सुनी है। सच्चाई से बता, वरना दंड मिलेगा।”

लड़के ने काँपती आवाज में सारा वृत्तान्त सुना दिया – “महाराज, मेरी माँ बहुत गरीब है। आज सकट चौथ का व्रत है। घर में तिल‑गुड़ तक नहीं है। माँ ने कहा था – ‘रोज काम करता है, तो थोड़ा तिल‑गुड़ उठा लाना, मैं सकट माता की पूजा कर लूँगी।’ मैं चोरी का पाप करना नहीं चाहता था, इसलिए मन ही मन ऊहापोह में था – तिल चुराऊँ तो पाप, गुड़ चुराऊँ तो पाप, माघ का महीना बड़ा पावन, क्या करूँ, क्या न करूँ? इसी ऊहापोह में मेरे मुँह से बातें निकल रहीं थीं, महाराज।”

राजा ने फिर भी शंका से देखा – “कैसे मान लूँ कि तू सच बोल रहा है? कहीं बातें बनाकर बचने की कोशिश तो नहीं?” लड़के ने विनम्रता से कहा – “महाराज, यदि आपको विश्वास न हो, तो अपने किसी आदमी को मेरे घर भेज दीजिए, मेरी माँ से पूछ लीजिए।”

राजा ने कुछ सिपाहियों को उसके घर भेजा। वे वहाँ पहुँचे, तो देखा कि एक बूढ़ी ब्राह्मणी अकेली झोंपड़ी में दीपक जलाए बैठी है, सामने साधारण‑सा थाल सजाकर सकट माता का स्मरण कर रही है। उन्होंने दरवाजे से ही आवाज दी – “अम्मा, बाहर आओ, राजा ने तुम्हें बुलाया है।”

अंदर से आवाज आई – “बेटा, मैं बाहर नहीं आ सकती, मेरी घोती (नीचे की साड़ी) फटी हुई है, मैं क्या करूँ? गरीब की यही दशा है।”

सैनिक दरबार लौटे और उन्होंने राजा से सारा हाल कह सुनाया। यह सुनकर राजा का हृदय पसीज गया। उसे यकीन हो गया कि लड़का सच बोल रहा है और उसकी माँ सचमुच दरिद्रता में पूजा कर रही है।

राजा ने तुरंत आदेश दिया – “इस लड़के पर कोई दंड नहीं लगेगा। इसके उलट, जितनी गाड़ियाँ यह भरकर अपने घर ले जाना चाहे, उतना अनाज, तिल, गुड़, कपड़ा, धन‑धान्य इसे दे दिया जाए। इसकी माँ से कह देना कि आज से इसे चोरी करने की कोई जरूरत नहीं। सकट माता की पूजा पूरे विधि‑विधान से करे और जीवन भर सुख से रहे।”

लड़के ने राजा के चरणों में गिरकर प्रणाम किया, राजमहल के भंडार से गाड़ियाँ भर‑भरकर सामान लादा। पहली बार उसके घर की कच्ची दहलीज पर भी धान, गेहूँ, तिल, गुड़ और कपड़ों के ढेर लग गए।

उस रात ब्राह्मणी ने बड़ी श्रद्धा से सकट माता की पूजा की। दीप जलाए, तिल‑गुड़ का भोग लगाया, मन ही मन बोली – “माता, सच बोलने वाले का आप ही सहारा हैं। आपने मेरे बेटे के मुँह से सच्चाई बुलवाई और उसके बदले हमें भरपूर जीवन दिया।”

इस तरह तीसरी सकट चौथ कथा हमें यह सीख दे जाती है कि भूख और गरीबी में भी यदि इंसान सच्चाई का दामन न छोड़े, तो राजा से लेकर सकट माता तक सबकी दया उस पर बरसती है।

सकट चौथ की चौथी व्रत कथा – निष्पुत्र राजा, दासी की बुद्धि और सकट माता का पुत्रदान

एक बड़े राज्य का एक राजा था। राजमहल, वैभव, शान‑ओ‑शौकत, कई रानियाँ, पर एक बड़ी कमी थी – उसे सन्तान नहीं थी। राजा वृद्ध होने लगा, पर पुत्र का मुँह न देख सका, इसी कारण हमेशा उदास, मन में खटास और चेहरे पर मलाल छाया रहता।

एक दिन राजा महल के फाटक के पास चुपचाप बैठा था। तभी उधर से एक भंगिन (सफाई का काम करने वाली औरत) गुज़र रही थी। रास्ते में उसे अपनी कोई सहेली मिली, वह झुंझलाकर बोली – “देखो तो, आज सवेर से ही निर्वंश राजा का मुँह देख लिया, बस समझो दिन खराब ही जाना है।”

यह ताना राजा के कानों में पड़ गया। उसके कलेजे में जैसे साँप लहराया। वह अंदर अपने कमरे में लौटा और बिस्तर पर मुँह फेरकर लेट गया। थोड़ी देर बाद रानियाँ इकट्ठी हुईं, किसी ने कहा – “महाराज, चलिए, भोजन कर लीजिए।” किसी ने आँचल से हवा की, किसी ने मीठी बातें कीं, पर राजा ने एक ही बात दोहराई – “इतना बड़ा राजपाट, इतने लोग, इतनी रानियाँ, पर कोई पुत्र नहीं। एक भंगिन तक मुझे निर्वंश कहकर चली गई, अब मेरा जी किस बात को लगे?”

सबको चिंता होने लगी, पर किसी के पास कोई उपाय न था। तभी छोटी रानी की एक दासी, जो बहुत चतुर और समझदार थी, आगे बढ़ी। उसने धीरे से छोटी रानी से कहा – “रानी माँ, आप घबराइए नहीं। जो मैं करूँ, आप चुपचाप देखते रहिए। मेरा विश्वास है, कुछ ही समय में राजा का यह दुख दूर हो जाएगा।”

फिर दासी राजा के पास गई और बोली – “महाराज, आप व्यर्थ शोक मत कीजिए। आपको एक शुभ समाचार देना है, पर आप पहले उठकर भोजन तो कर लीजिए।” राजा ने अनमने मन से पूछा – “कौन‑सा शुभ समाचार?” दासी ने आदर से कहा – “महाराज, छोटी रानी गर्भवती हैं। आपके यहाँ भी अब पुत्र रत्न आने वाला है।”

यह सुनकर राजा के मुरझाए चेहरे पर जैसे वसंत उतर आया। वह तुरंत उठ बैठा, नहा‑धोकर पूजा की, भोजन किया और मन ही मन नौ महीने का इंतज़ार करने लगा। सारा महल यह मान बैठा कि छोटी रानी माँ बनने वाली है। पर असल में तो यह दासी की रणनीति थी, रानी तो गर्भवती थी ही नहीं।

समय बीता, दासी ने नौ महीने बाद महल में चारों तरफ पर्दे लगवा दिए और घोषणा की – “आज छोटी रानी को पुत्र हुआ है।” राजा ने पूरे राज्य में उत्सव मनाया, दान‑दक्षिणा, भोज, गरीबों को अनाज, सब कुछ बँटा। जब उत्सव शांत हुआ, तो राजा ने दासी से कहा – “अब मेरा बेटा मुझे दिखाओ।”

दासी मुश्किल में पड़ गई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। बोली – “महाराज, अभी तो बच्चा बहुत नाजुक है, नजर लग जाएगी। आप उसका पसवन (जन्मोत्सव) में दर्शन करिएगा।” राजा फिर भी मान गया, इंतजार करता रहा।

पसवन का समय आया, विधि‑विधान हुए, पर जब राजा ने फिर पूछा – “अब तो मुझे मेरे बेटे का मुंह दिखाओ”, दासी फिर टाल गई – “महाराज, इसके ग्रह कुछ ठीक नहीं, अभी दिखाने से अनिष्ट हो सकता है। आप मुण्डन में देख लीजिएगा।”

मुण्डन संस्कार का दिन आया, राजकाज का रेला उमड़ पड़ा। राजा ने फिर दोहराया – “अब तो राजकुमार को दिखाओ।” दासी ने एक बार फिर कहा – “महाराज, अभी भी समय ठीक नहीं है। सीधे उसकी शादी में देखिएगा, आप तो धैर्य रखें।”

छोटी रानी अंदर‑ही‑अंदर घुलती जा रही थी – “अगर कभी सच खुल गया, तो राजा मुझे भी दंड देगा और दासी को भी, फिर क्या होगा?” पर दासी उसे समझाती रही – “रानी माँ, आप चिंता छोड़िए, सकट माता हैं न, वही कुछ न कुछ कर देंगी, आप अपने मन में बस प्रार्थना करती रहिए।”

समय ऐसे ही कटता गया। जब कालचक्र ने सोलह साल पूरे कर दिए, तो बड़े‑बड़े राज्यों से राजकुमारों के विवाह के प्रस्ताव आने लगे। राजा ने सोचा – “अब तो अपने राजकुमार की शादी करूँगा।” उसने दासी से कहा – “शादी की तैयारियाँ कर, मेरा बेटा अब जवान हो गया है।”

दासी ने निडरता से कहा – “महाराज, जैसे आपकी आज्ञा। पर एक अर्ज है – जब बारात जाएगी, तो राजकुमार की डोली में मैं भी साथ बैठूँगी।” राजा ने हँसकर हाँ कर दी, उसे तो बेटे को देखने की जल्दी थी।

शादी की तारीख तय हुई, राज्य सजा, बाजे बजे, बारात की तैयारी होने लगी। राजा ने अंतिम बार दासी को टोका – “अब तो राजकुमार को दिखा दे, बारात चलने वाली है।” दासी ने कहा – “महाराज, आप चिंता न करें, आप द्वारचार में अपने बेटे के साक्षात दर्शन करेंगे।”

फिर वह महल के भीतर गई, एक बड़ी‑सी थाली में तिल और गुड़ भरकर उसमें एक सुंदर, गोरा‑चिट्टा युवक लिटाया – यह सकट माता की कृपा से उसे मिला दिव्य पुत्र था, जैसा कथा के भाव में आता है। थाली को घूँघट की तरह ढँककर, उसे डोली में रखकर स्वयं साथ बैठ गई। पूरा रास्ता वह मन में एक ही बात दोहराती रही – “सकट माता, आज आपकी ही लाज है, मैंने हर मोड़ पर राजा को टाल दिया, अब आप ही कृपा करिए।”

रास्ते में बारात एक पुराने पीपल के पेड़ के चबूतरे पर आराम के लिए रुकी। वहीं पास में एक तालाब था। दासी ने सोचा – “मैं जल्दी से नहा‑धो लूँ, फिर डोली पर बैठूँगी।” उसने डोली चबूतरे पर रखवाई और नहाने चली गई।

यही वह स्थान था, जहाँ सकट देवी उसी समय अदृश्य रूप से विराजमान थीं। उन्होंने देखा कि डोले के पास‑पास चींटियाँ कुछ मीठी‑मीठी चीज़ पर चढ़‑उतर रही हैं। उन्होंने डोले के पर्दे को हल्का‑सा सरकाकर देखा, तो पाया कि थाली में तिल‑गुड़ भरा है। देवी ने सोचा – “ज़रा स्वाद तो देखूँ, कैसी मीठी चीज़ है।”

धीरे‑धीरे उन्होंने थाली से कुछ तिल और गुड़ उठाकर मुँह में डाला। स्वाद उन्हें बहुत प्रिय लगा। वे खाते‑खाते इतना तल्लीन हो गईं कि कब सारा तिल‑गुड़ खा गईं, उन्हें खुद भी भान न रहा।

इधर नहाकर दासी लौटी, डोली के पास आई, थाली का ढक्कन हटाया, तो उसकी तो जैसे साँस अटक गई – थाली पूरी खाली थी! वह जोर‑जोर से रोने लगी, सीधे पास बैठी सकट देवी के चरणों पर गिर पड़ी और फूट‑फूटकर बोली –


“माता, मेरा बेटा कहाँ गया? मैं थाली में बेटा बनाकर लाई थी, आप ही ने उसे खा लिया! अब आप ही मुझे बेटा दीजिए, नहीं तो मैं आपके पैर नहीं छोड़ूँगी।”

सकट माता संकट में पड़ गईं। बोलीं – “बेटी, मैं तो केवल तिल‑गुड़ खाने आई थी, मुझे क्या पता था कि इसमें तुम्हारी इतनी बड़ी आस लगी है। अब तू मेरा आँचल पकड़े खड़ी है, रो मत। अच्छा, तू पैर छोड़, मैं तुझे पुत्र देती हूँ।”

यह कहकर सकट माता ने अपनी दिव्य शक्ति से सोलह वर्ष का सुंदर राजकुमार प्रकट कर दिया, जो हर दृष्टि से राजाओं के पुत्र जैसा तेजस्वी और सुशील था। दासी की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने मन ही मन माता को धन्यवाद दिया और जल्दी‑जल्दी उसे डोली में बिठाकर घूँघट ढँक दिया।

जब बारात वधू के दरवाजे पहुँची, राजा अधीरता से दासी के पास आए – “अब तो मेरा राजकुमार दिखाओ।” दासी ने डोली का पर्दा हटाया। सामने सुन्दर, तेज से दमकता युवक बैठा था। राजा के मुँह से बरबस निकल पड़ा – “वाह! इतना सुंदर मेरा बेटा, तभी तो तुमने इसे नजर से बचाकर रखा था!”

शादी बड़े धूमधाम से सम्पन्न हुई। जब बारात वापस लौटी, छोटी रानी अभी भी अचेत जैसी पड़ी थी, सोच‑सोचकर कि न जाने क्या हुआ होगा। जैसे ही बारात महल के द्वार पर पहुँची, दासी भागती हुई छोटी रानी के पास आई और बोली – “रानी माँ, चलो, राजकुमार और बहू का परछन कर लो।” रानी ने जैसे ही अपने सामने खड़े राजकुमार और बहू को देखा, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा, आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।

दासी ने मुस्कुराकर कहा – “रानी माँ, हम तो सवा पसेरी (थोड़े से) तिल‑गुड़ का लड़का बनाकर ले गई थीं, पर सकट माता ने कृपा करके सवा मन का, सुंदर, सुदर्शन पुत्र दे दिया। अब आप सकट माता का धन्यवाद कीजिए, खूब तिल‑गुड़ मंगाकर कूटो, लड्डू बनाओ और सबमें प्रसाद बाँटो।”

तब से मान्यता है कि जो स्त्री निसंतान हो, या संतान की कामना रखती हो, वह पूरे विधि‑विधान से सकट चौथ का व्रत करे, कथा सुने और तिल‑गुड़ का दान‑प्रसाद दे, तो सकट माता उसकी गोद भी भर देती हैं, जैसा समय और भाग्य हो।

सकट चौथ व्रत का भाव और महिमा

इन चारों कथाओं से एक ही बात बार‑बार सामने आती है – सकट चौथ केवल रूढ़ि या डर का त्योहार नहीं है, बल्कि यह माँ की ममता, सच्चाई, सरलता और भरोसे का पर्व है।

  • पहली कथा सिखाती है कि दिखावटी गरीबी नहीं, सच्चा मन चाहिए।
  • दूसरी कथा बताती है कि मासूम बच्चों की जान पर बना संकट भी, सकट माता टाल सकती हैं।
  • तीसरी कथा से सीख मिलती है कि गरीबी में भी ईमानदारी रखो तो भगवान और राजा दोनों की कृपा मिलती है।
  • चौथी कथा कहती है कि जहाँ आस्था और धैर्य हो, वहाँ सकट माता बाँझ गोद में भी हँसता‑खेलता बालक बैठा देती हैं।

इसी विश्वास के साथ हर साल माघ महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को माताएँ सकट चौथ का व्रत रखती हैं, दिन‑भर निर्जला या फलाहार रहकर, शाम को गणेश जी और सकट माता की पूजा करती हैं, चाँद को अर्घ्य देती हैं और यह पावन सकट चौथ व्रत कथा श्रद्धा से सुन‑सुनाती हैं।

 

 

 

 

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