
श्रीमद भगवद गीता अध्याय 6: आत्मसंयम योग – सभी 47 श्लोक और हिंदी अर्थ
श्रीमद भगवद गीता का छठा अध्याय, जिसे आत्मसंयम योग या ध्यान योग के नाम से जाना जाता है, ध्यान और आत्म-नियंत्रण के महत्व को दर्शाता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को योग की प्रक्रिया, मन के नियंत्रण, और आत्मा की शांति प्राप्त करने के मार्ग के बारे में मार्गदर्शन करते हैं। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं, जो नीचे संस्कृत में उनके हिंदी अर्थ के साथ दिए गए हैं।
श्लोक 1
श्री भगवानुवाच:
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥
अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: जो व्यक्ति कर्म के फल की इच्छा किए बिना अपने कर्तव्य का पालन करता है, वही सच्चा संन्यासी और योगी है। न तो वह जो अग्नि (यज्ञ आदि) को त्याग देता है, और न ही वह जो कर्म करना छोड़ देता है।
श्लोक 2
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन॥
अर्थ: हे अर्जुन, जिसे संन्यास कहते हैं, उसे ही योग समझ। क्योंकि कोई भी व्यक्ति बिना संकल्प (इच्छाओं) को त्यागे योगी नहीं बन सकता।
श्लोक 3
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥
अर्थ: जो योग में प्रवेश करना चाहता है, उसके लिए कर्म को योग का साधन कहा जाता है। और जो योग में सिद्ध हो चुका है, उसके लिए शांति (मन का संयम) ही साधन है।
श्लोक 4
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जति।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥
अर्थ: जब व्यक्ति न तो इंद्रियों के विषयों में आसक्त होता है और न ही कर्मों में, और सभी संकल्पों का त्याग कर देता है, तब उसे योगारूढ़ (योग में सिद्ध) कहा जाता है।
श्लोक 5
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
अर्थ: व्यक्ति को अपने मन से अपने आप को ऊपर उठाना चाहिए और अपने आप को नीचे नहीं गिराना चाहिए, क्योंकि मन ही आत्मा का मित्र है और मन ही आत्मा का शत्रु है।
श्लोक 6
बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥
अर्थ: जिसने अपने मन को जीत लिया है, उसके लिए मन उसका मित्र है। लेकिन जिसका मन अनियंत्रित है, उसके लिए वही मन शत्रु की तरह व्यवहार करता है।
श्लोक 7
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥
अर्थ: जिसने अपने मन को जीत लिया और जो शांत है, उसका परमात्मा के साथ समन्वय हो जाता है। वह सर्दी-गर्मी, सुख-दुख, और मान-अपमान में समान रहता है।
श्लोक 8
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥
अर्थ: जिसका मन ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो अटल है, जिसकी इंद्रियाँ नियंत्रित हैं, और जो मिट्टी, पत्थर और सोने को समान देखता है, उसे युक्त (योगी) कहा जाता है।
श्लोक 9
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥
अर्थ: जो मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य, बंधु, साधु और पापी के प्रति समान दृष्टि रखता है, वह श्रेष्ठ है।
श्लोक 10
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥
अर्थ: योगी को एकांत में रहकर, मन और इंद्रियों को नियंत्रित करते हुए, आशा और स्वामित्व की भावना से मुक्त होकर, निरंतर आत्मा को परमात्मा में संनाद करना चाहिए।
श्लोक 11-12
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥
अर्थ: योगी को पवित्र स्थान पर, न बहुत ऊँचा और न बहुत नीचा, कुशा, मृगचर्म और वस्त्र से बना आसन बिछाकर बैठना चाहिए। वहाँ एकाग्रचित्त होकर, मन और इंद्रियों को नियंत्रित करके, आत्मशुद्धि के लिए योग का अभ्यास करना चाहिए।
श्लोक 13-14
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥
अर्थ: शरीर, सिर और गले को सीधा और स्थिर रखकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर, चारों ओर न देखते हुए, शांत मन, भयमुक्त और ब्रह्मचर्य व्रत में स्थिर होकर, मन को नियंत्रित करते हुए, मुझमें चित्त लगाकर योगी को मेरे प्रति समर्पित होकर बैठना चाहिए।
श्लोक 15
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥
अर्थ: इस प्रकार निरंतर आत्मा को योग में लगाने वाला, मन को नियंत्रित करने वाला योगी मेरे में स्थित परम शांति और मोक्ष को प्राप्त करता है।
श्लोक 16
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥
अर्थ: हे अर्जुन, न तो बहुत अधिक खाने वाले का, न ही बिल्कुल न खाने वाले का, न बहुत अधिक सोने वाले का, और न ही हमेशा जागने वाले का योग सिद्ध होता है।
श्लोक 17
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
अर्थ: जो व्यक्ति आहार और विहार में संतुलित, कर्मों में संयमित, और नींद व जागरण में संतुलित है, उसका योग दुखों का नाश करने वाला होता है।
श्लोक 18
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥
अर्थ: जब मन पूरी तरह नियंत्रित होकर आत्मा में ही स्थिर हो जाता है और सभी इच्छाओं से मुक्त हो जाता है, तब वह योगी युक्त (सिद्ध) कहलाता है।
श्लोक 19
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गति सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥
अर्थ: जैसे बिना हवा के स्थान पर रखा दीपक टिमटिमाता नहीं, वैसे ही योगी का नियंत्रित मन, जो आत्मा में योग का अभ्यास करता है, स्थिर रहता है।
श्लोक 20-23
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तवyo योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥
अर्थ: जहाँ योग के अभ्यास से नियंत्रित मन शांत हो जाता है, जहाँ आत्मा को आत्मा में देखकर व्यक्ति संतुष्ट होता है, जहाँ उसे बुद्धि से ग्रहण करने योग्य, इंद्रियों से परे असीम सुख की प्राप्ति होती है, और जहाँ वह सत्य से विचलित नहीं होता, वह योग है। उस अवस्था में प्राप्त लाभ को वह सबसे बड़ा मानता है, और उसमें स्थित होकर वह भारी दुख से भी विचलित नहीं होता। इस दुख के संयोग से मुक्ति को योग कहते हैं, जिसे दृढ़ निश्चय और उत्साह के साथ अभ्यास करना चाहिए।
श्लोक 24
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियस्य समन्ततः॥
अर्थ: सभी संकल्पों से उत्पन्न होने वाली इच्छाओं का पूरी तरह त्याग करके, मन से ही समस्त इंद्रियों को हर दिशा में नियंत्रित करना चाहिए।
श्लोक 25
शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥
अर्थ: धैर्यपूर्वक बुद्धि से धीरे-धीरे मन को शांत करना चाहिए और उसे आत्मा में स्थिर करके कुछ भी चिंतन नहीं करना चाहिए।
श्लोक 26
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥
अर्थ: जब-जब यह चंचल और अस्थिर मन भटकता है, तब-तब इसे नियंत्रित करके आत्मा में स्थिर करना चाहिए।
श्लोक 27
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥
अर्थ: जिस योगी का मन शांत है, जो रजोगुण से मुक्त है, और जो ब्रह्म के साथ एकरूप होकर पापरहित है, उसे परम सुख की प्राप्ति होती है।
श्लोक 28
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥
अर्थ: इस प्रकार निरंतर आत्मा को योग में लगाने वाला, पापरहित योगी सहजता से ब्रह्म के संपर्क से अनंत सुख प्राप्त करता है।
श्लोक 29
सर्वं विश्वमिदं सर्वं सर्वं च मयि संनादति।
सर्वं विश्वमिदं सर्वं सर्वं च मयि संनादति॥
अर्थ: योगी, जो योग में संनाद है, वह समस्त विश्व को अपने में और अपने को परमात्मा में देखता है।
श्लोक 30
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
अर्थ: जो मुझे सर्वत्र देखता है और सर्वं को मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए कभी अदृश्य नहीं होता।
श्लोक 31
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तति॥
अर्थ: जो योगी एकत्व की भावना से मुझको सभी प्राणियों में स्थित देखकर मेरी भक्ति करता है, वह हर प्रकार से व्यवहार करते हुए भी मुझमें ही रहता है।
श्लोक 32
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥
अर्थ: हे अर्जुन, जो योगी सभी प्राणियों में सुख और दुख को अपने समान देखता है, वह सर्वश्रेष्ठ योगी माना जाता है।
श्लोक 33
अर्जुन उवाच:
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्॥
अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे मधुसूदन, आपने जो यह योग समता के साथ बताया है, इसके स्थिर रहने को मैं मन की चंचलता के कारण नहीं देखता।
श्लोक 34
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥
अर्थ: हे कृष्ण, मन बहुत चंचल, अशांत, बलवान और दृढ़ है। मुझे लगता है कि इसे नियंत्रित करना वायु को रोकने के समान कठिन है।
श्लोक 35
श्री भगवानुवाच:
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण ने कहा: हे महाबाहु अर्जुन, निस्संदेह मन चंचल और कठिनता से नियंत्रित होने वाला है। फिर भी, अभ्यास और वैराग्य के द्वारा इसे वश में किया जा सकता है।
श्लोक 36
असंयतात्मना योगो दुष्प्रापः इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥
अर्थ: मेरी मान्यता है कि जिसका मन नियंत्रित नहीं है, उसके लिए योग प्राप्त करना कठिन है। परंतु जिसने मन को वश में किया है, वह प्रयास और उपायों से योग को प्राप्त कर सकता है।
श्लोक 37
अर्जुन उवाच:
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥
अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण, जो व्यक्ति श्रद्धा से युक्त होकर योग का अभ्यास करता है, परंतु मन की चंचलता के कारण योग में सिद्धि प्राप्त नहीं करता, वह किस गति को प्राप्त करता है?
श्लोक 38
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥
अर्थ: हे महाबाहु, क्या वह दोनों (सांसारिक और आध्यात्मिक) से भ्रष्ट होकर, छिन्न-भिन्न बादल की तरह ब्रह्म के मार्ग में भटककर नष्ट नहीं हो जाता?
श्लोक 39
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥
अर्थ: हे कृष्ण, मेरे इस संदेह को पूरी तरह से दूर करें, क्योंकि आपके सिवाय कोई और इस संदेह का निवारण नहीं कर सकता।
श्लोक 40
श्री भगवानुवाच:
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दurgatiं तात गच्छति॥
अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण ने कहा: हे पार्थ, न तो इस लोक में और न ही परलोक में उसका विनाश होता है। क्योंकि जो कल्याणकारी कार्य करता है, वह कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 41
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥
अर्थ: योग से भ्रष्ट हुआ व्यक्ति पुण्यकर्मियों के लोकों को प्राप्त कर, वहाँ अनंत वर्षों तक रहकर, फिर पवित्र और समृद्ध लोगों के घर में जन्म लेता है।
श्लोक 42
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥
अर्थ: अथवा वह बुद्धिमान योगियों के कुल में जन्म लेता है। ऐसा जन्म इस लोक में अत्यंत दुर्लभ है।
श्लोक 43
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतति च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥
अर्थ: वहाँ उसे पूर्व जन्म की बुद्धि का संयोग प्राप्त होता है, और वह फिर से योग की सिद्धि के लिए प्रयास करता है,
, हे कुरुनंदन।
श्लोक 44
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥
अर्थ: अपने पूर्वजन्म के अभ्यास के कारण वह अनायास ही योग की ओर आकर्षित होता है। योग का जिज्ञासु भी वेदों के शब्द-ज्ञान को पार कर जाता है।
श्लोक 45
प्रयत्नाद् यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥
अर्थ: प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी, अपने पापों से शुद्ध होकर, अनेक जन्मों में सिद्धि प्राप्त करके परम गति को प्राप्त करता है।
श्लोक 46
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्मात् योगी भवार्जुन॥
अर्थ: योगी तपस्वियों से, ज्ञानियों से, और कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ माना जाता है। इसलिए, हे अर्जुन, तुम योगी बनो।
श्लोक 47
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान् भजति यो मां स मे युक्ततमो मतः॥
अर्थ: सभी योगियों में भी, जो श्रद्धापूर्वक अपने अंतःकरण से मुझमें लीन होकर मुझे भजता है, उसे मैं सबसे श्रेष्ठ योगी मानता हूँ।
इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने ध्यान योग की प्रक्रिया, आत्म-नियंत्रण, और मन की शांति प्राप्त करने के तरीकों पर प्रकाश डाला है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि सच्चा योगी वह है जो मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है, सभी प्राणियों के प्रति समान दृष्टि रखता है, और परमात्मा में लीन होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है।
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