श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग | पूर्ण श्लोक, हिंदी भावार्थ और English Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग | पूर्ण श्लोक, हिंदी भावार्थ और English Meaning

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 मोक्षसंन्यासयोग श्रीमद्भगवद्गीता का अंतिम और अत्यंत गूढ़ अध्याय है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण संन्यास, त्याग, कर्म, ज्ञान, भक्ति और मोक्ष के अंतिम सिद्धांतों का सार प्रस्तुत करते हैं। यह अध्याय समस्त गीता का निष्कर्ष है और जीवन के परम लक्ष्य – आत्मबोध और परमशांति – का मार्ग दिखाता है।

अध्याय 18 में कुल 78 श्लोक हैं। इसमें त्याग के तीन प्रकार, ज्ञान के तीन भेद, कर्म की प्रकृति, बुद्धि और धृति का विश्लेषण तथा अंत में “सर्वधर्मान् परित्यज्य” का दिव्य उपदेश शामिल है।

श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 18 (मोक्षसंन्यासयोग)

श्लोक 1 से 78 तक (पूर्ण, अर्थ सहित)


🔹 श्लोक 1

अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥18-1॥

हिंदी भावार्थ:

अर्जुन कहते हैं – हे महाबाहु श्रीकृष्ण! मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को पृथक-पृथक जानना चाहता हूँ।

English Meaning:

Arjuna said: O mighty-armed Krishna, I wish to understand the true nature of renunciation (Sannyasa) and abandonment (Tyaga) separately.


🔹 श्लोक 2

श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥18-2॥

हिंदी भावार्थ:

भगवान कहते हैं – काम्य कर्मों का त्याग संन्यास कहलाता है, और सभी कर्मों के फल का त्याग ‘त्याग’ कहलाता है।

English Meaning:

The Lord said: Giving up desire-driven actions is called Sannyasa; abandoning the fruits of all actions is known as Tyaga.


🔹 श्लोक 3

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥18-3॥

हिंदी भावार्थ:

कुछ विद्वान कर्म को दोषयुक्त मानकर त्याज्य कहते हैं, परंतु अन्य कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप का त्याग नहीं करना चाहिए।

English Meaning:

Some philosophers say action is flawed and should be renounced; others declare that sacrifice, charity, and austerity should never be abandoned.


🔹 श्लोक 4

निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥18-4॥

हिंदी भावार्थ:

हे अर्जुन! त्याग तीन प्रकार का बताया गया है — सात्त्विक, राजस और तामस।

English Meaning:

Hear from Me the truth about Tyaga; it is declared to be of three kinds.


🔹 श्लोक 5

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥18-5॥

हिंदी भावार्थ:

यज्ञ, दान और तप का त्याग नहीं करना चाहिए; ये मनुष्य को पवित्र बनाते हैं।

English Meaning:

Sacrifice, charity, and austerity should not be abandoned; they purify the wise.


🔹 श्लोक 6

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥18-6॥

हिंदी भावार्थ:

इन कर्मों को भी आसक्ति और फल का त्याग करके करना चाहिए — यही मेरा श्रेष्ठ मत है।

English Meaning:

Even these actions must be performed, abandoning attachment and fruits.


🔹 श्लोक 7

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥18-7॥

हिंदी भावार्थ:

कर्तव्य कर्म का त्याग उचित नहीं है; मोहवश किया गया त्याग तामस कहलाता है।

English Meaning:

Renouncing obligatory duty out of delusion is Tamasic.


🔹 श्लोक 8

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥18-8॥

हिंदी भावार्थ:

शारीरिक कष्ट के भय से कर्म त्याग देना राजस त्याग है।

English Meaning:

Abandoning action due to fear of discomfort is Rajasic.


🔹 श्लोक 9

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥18-9॥

हिंदी भावार्थ:

कर्तव्य समझकर, फल की आसक्ति छोड़कर किया गया कर्म सात्त्विक त्याग है।

English Meaning:

Doing duty without attachment or desire for fruit is Sattvic renunciation.


🔹 श्लोक 10

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥18-10॥

हिंदी भावार्थ:

सच्चा त्यागी न बुरे कर्म से द्वेष करता है, न अच्छे कर्म से आसक्त होता है।

English Meaning:

The true renouncer neither hates unpleasant work nor clings to pleasant work.


🔹 श्लोक 11

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥18-11॥

हिंदी भावार्थ:

शरीरधारी व्यक्ति पूर्णतः कर्म नहीं छोड़ सकता; फल त्यागने वाला ही त्यागी है।

English Meaning:

It is impossible to give up actions entirely; he who renounces fruits is the true renouncer.


🔹 श्लोक 12

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥18-12॥

हिंदी भावार्थ:

जो त्याग नहीं करता उसे कर्म का तीन प्रकार का फल मिलता है; त्यागी को नहीं।

English Meaning:

The non-renouncer receives threefold fruits of action; the renouncer does not.


🔹 श्लोक 13

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥18-13॥

हिंदी भावार्थ:

हर कर्म की सिद्धि के पाँच कारण होते हैं।

English Meaning:

Learn from Me the five causes of action.


🔹 श्लोक 14

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥18-14॥

हिंदी भावार्थ:

स्थान, कर्ता, साधन, प्रयास और दैव — ये पाँच कारण हैं।

English Meaning:

The seat, the doer, the instruments, the efforts, and destiny are the five causes.


🔹 श्लोक 15

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥18-15॥

हिंदी भावार्थ:

मन, वाणी और शरीर से किया गया हर कर्म इन्हीं पाँच कारणों से होता है।

English Meaning:

Every action done by body, speech, or mind has these five causes.


🔹 श्लोक 16

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥18-16॥

हिंदी भावार्थ:

जो आत्मा को ही एकमात्र कर्ता मानता है, वह अज्ञान से ग्रस्त है।

English Meaning:

One who sees the Self alone as the doer lacks proper understanding.


🔹 श्लोक 17

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥18-17॥

हिंदी भावार्थ:

जिसमें अहंकार नहीं, वह कर्म करते हुए भी बंधता नहीं।

English Meaning:

He who is free from ego is not bound by action.


🔹 श्लोक 18

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥18-18॥

हिंदी भावार्थ:

ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता — ये तीन प्रेरक हैं; कर्ता, साधन और कर्म — ये तीन कर्म के अंग हैं।

English Meaning:

Knowledge, the object, and the knower motivate action; instrument, action, and doer are its components.


🔹 श्लोक 19

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥18-19॥

हिंदी भावार्थ:

ज्ञान, कर्म और कर्ता तीनों गुणों के अनुसार तीन प्रकार के हैं।

English Meaning:

Knowledge, action, and doer are of three kinds according to gunas.


🔹 श्लोक 20

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥18-20॥

हिंदी भावार्थ:

जो सबमें एक ही अविनाशी परमात्मा को देखता है, वह सात्त्विक ज्ञान है।

English Meaning:

That knowledge which sees the one imperishable Reality in all beings is Sattvic.

🔹 श्लोक 21

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥18-21॥

हिंदी भावार्थ:

जो ज्ञान सब प्राणियों में भिन्न-भिन्न भावों को अलग-अलग देखता है, वह राजस ज्ञान है।

English Meaning:

Knowledge that sees diversity in all beings as separate is Rajasic.


🔹 श्लोक 22

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥18-22॥

हिंदी भावार्थ:

जो ज्ञान तर्कहीन होकर केवल एक वस्तु को ही सर्वस्व मानता है, वह तामस ज्ञान है।

English Meaning:

Knowledge clinging to one limited aspect without reason is Tamasic.


🔹 श्लोक 23

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥18-23॥

हिंदी भावार्थ:

कर्तव्य समझकर, राग-द्वेष रहित और फल की इच्छा बिना किया गया कर्म सात्त्विक है।

English Meaning:

Duty done without attachment or desire for fruit is Sattvic.


🔹 श्लोक 24

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥18-24॥

हिंदी भावार्थ:

जो कर्म अहंकार और भोग की इच्छा से किया जाए, वह राजस है।

English Meaning:

Action done with ego and desire is Rajasic.


🔹 श्लोक 25

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥18-25॥

हिंदी भावार्थ:

परिणाम, हानि और हिंसा की परवाह किए बिना किया गया कर्म तामस है।

English Meaning:

Action begun in delusion without considering consequences is Tamasic.


🔹 श्लोक 26

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥18-26॥

हिंदी भावार्थ:

जो कर्ता अहंकार रहित, धैर्यवान और सफलता-असफलता में समान रहे — वह सात्त्विक है।

English Meaning:

The doer free from ego and steady in success or failure is Sattvic.


🔹 श्लोक 27

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥18-27॥

हिंदी भावार्थ:

जो कर्ता फल का लोभी और हर्ष-शोक से युक्त हो — वह राजस है।

English Meaning:

The passionate, greedy, and emotional doer is Rajasic.


🔹 श्लोक 28

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥18-28॥

हिंदी भावार्थ:

आलसी, जड़ और छलपूर्ण कर्ता तामस कहलाता है।

English Meaning:

The lazy, deceitful, and dull doer is Tamasic.


🔹 श्लोक 29

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥18-29॥

हिंदी भावार्थ:

हे धनंजय! अब तू बुद्धि और धृति (धारण शक्ति) के भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार के भेद को मुझसे विस्तारपूर्वक सुन।

English Meaning:

Hear from Me, O Dhananjaya, the threefold division of intellect and firmness according to the qualities.


🔹 श्लोक 30

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥18-30॥

हिंदी भावार्थ:

हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति, कर्तव्य और अकर्तव्य, भय और अभय तथा बंधन और मोक्ष को सही रूप से जानती है, वह सात्त्विकी बुद्धि है।

English Meaning:

The intellect that knows action and inaction, duty and non-duty, fear and fearlessness, bondage and liberation is Sattvic.


🔹 श्लोक 31

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥18-31॥

हिंदी भावार्थ:

जो बुद्धि धर्म और अधर्म तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को ठीक प्रकार से नहीं समझती, वह राजसी बुद्धि है।

English Meaning:

The intellect that incorrectly understands right and wrong is Rajasic.


🔹 श्लोक 32

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥18-32॥

हिंदी भावार्थ:

जो बुद्धि तमोगुण से ढकी होकर अधर्म को भी धर्म समझती है, वह तामसी बुद्धि है।

English Meaning:

The intellect clouded by darkness, seeing wrong as right, is Tamasic.


🔹 श्लोक 33

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥18-33॥

हिंदी भावार्थ:

जिस अविचल धृति से मनुष्य मन, प्राण और इंद्रियों को संयमित रखता है, वह सात्त्विकी धृति है।

English Meaning:

Firmness that controls mind, life-force and senses through yoga is Sattvic.


🔹 श्लोक 34

यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥18-34॥

हिंदी भावार्थ:

जो धृति फल की इच्छा से धर्म, अर्थ और काम को धारण करती है, वह राजसी है।

English Meaning:

Firmness attached to results and worldly aims is Rajasic.


🔹 श्लोक 35

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥18-35॥

हिंदी भावार्थ:

जो धृति निद्रा, भय, शोक और मोह को नहीं छोड़ती, वह तामसी है।

English Meaning:

Firmness that clings to fear, grief and delusion is Tamasic.


🔹 श्लोक 36

सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥18-36॥

हिंदी भावार्थ:

हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को सुन, जिसमें अभ्यास से आनंद मिलता है और जो अंततः दुःख का अंत करता है।

English Meaning:

Hear from Me of the threefold pleasure that leads to the end of sorrow.


🔹 श्लोक 37

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥18-37॥

हिंदी भावार्थ:

जो सुख आरंभ में विष समान लगे, पर अंत में अमृत जैसा हो, वह सात्त्विक सुख है।

English Meaning:

Pleasure like poison at first but nectar in the end is Sattvic.


🔹 श्लोक 38

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥18-38॥

हिंदी भावार्थ:

जो सुख इंद्रिय-विषय के संयोग से प्रारंभ में मधुर लगे, पर अंत में दुःख दे, वह राजस सुख है।

English Meaning:

Pleasure from sense-contact, sweet at first but bitter later, is Rajasic.


🔹 श्लोक 39

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥18-39॥

हिंदी भावार्थ:

जो सुख आलस्य और मोह से उत्पन्न हो और भ्रम में डाल दे, वह तामस सुख है।

English Meaning:

Pleasure born of sleep and laziness is Tamasic.


🔹 श्लोक 40

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥18-40॥

हिंदी भावार्थ:

पृथ्वी या स्वर्ग में कोई भी प्राणी तीन गुणों से मुक्त नहीं है।

English Meaning:

No being is free from the three gunas.


🔹 श्लोक 41

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥18-41॥

हिंदी भावार्थ:

हे परंतप (अर्जुन)! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र — इन चारों वर्णों के कर्म उनके स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभाजित किए गए हैं।

अर्थात् समाज में प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके स्वभाव और गुणों से निर्धारित होता है।

English Meaning:

O Arjuna, the duties of Brahmanas, Kshatriyas, Vaishyas, and Shudras are divided according to the qualities born of their nature.


🔹 श्लोक 42

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥18-42॥

हिंदी भावार्थ:

मन का संयम (शम), इंद्रियों का नियंत्रण (दम), तप, शुद्धता, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और ईश्वर में आस्था — ये सब ब्राह्मण के स्वभावजन्य कर्म हैं।

अर्थात् जो व्यक्ति शांतचित्त, संयमी, ज्ञानवान और आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाला है, वही ब्राह्मणत्व का अधिकारी है।

English Meaning:

Serenity, self-control, austerity, purity, forgiveness, uprightness, knowledge, wisdom, and faith in God are the natural duties of a Brahmana.


🔹 श्लोक 43

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥18-43॥

हिंदी भावार्थ:

शौर्य, तेज, धैर्य, कुशलता, युद्ध से न भागना, दान और नेतृत्व भावना — ये क्षत्रिय के स्वभावजन्य कर्म हैं।

अर्थात् जो व्यक्ति साहसी, नेतृत्वकारी और रक्षक स्वभाव का है, वह क्षत्रिय धर्म का पालन करता है।

English Meaning:

Heroism, strength, determination, skill, not fleeing from battle, generosity, and leadership are the natural duties of a Kshatriya.


🔹 श्लोक 44

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥18-44॥

हिंदी भावार्थ:

खेती, गौपालन और व्यापार वैश्य के स्वभावजन्य कर्म हैं।
सेवा करना शूद्र का स्वभावजन्य कर्म है।

अर्थात् आर्थिक व्यवस्था और सेवा-भाव भी समाज के संतुलन के लिए आवश्यक हैं।

English Meaning:

Agriculture, cow protection, and trade are the natural duties of a Vaishya; service is the natural duty of a Shudra.



🔹 श्लोक 45

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥18-45॥

हिंदी भावार्थ:

अपने स्वभाविक कर्म में लगे रहकर मनुष्य परम सिद्धि प्राप्त करता है।

English Meaning:

By being devoted to one’s own duty, a person attains perfection.


🔹 श्लोक 46

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥18-46॥

हिंदी भावार्थ:

जिस परमात्मा से सबकी उत्पत्ति हुई, उसी की पूजा अपने कर्म द्वारा करने से सिद्धि मिलती है।

English Meaning:

By worshipping Him through one’s duty, one attains perfection.


🔹 श्लोक 47

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥18-47॥

हिंदी भावार्थ:

दूसरे के उत्तम धर्म से अपना साधारण धर्म श्रेष्ठ है।

English Meaning:

Better one’s own duty imperfectly done.


🔹 श्लोक 48

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥18-48॥

हिंदी भावार्थ:

दोषयुक्त होने पर भी अपने स्वभाविक कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।

English Meaning:

One should not abandon natural duty even if flawed.


🔹 श्लोक 49

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥18-49॥

हिंदी भावार्थ:

जिस मनुष्य की बुद्धि सर्वत्र आसक्ति रहित है, जिसने अपने मन और इंद्रियों को वश में कर लिया है तथा जिसकी स्पृहा (इच्छाएँ) समाप्त हो गई हैं, वह संन्यास के द्वारा परम नैष्कर्म्य सिद्धि को प्राप्त करता है।

अर्थात् जो व्यक्ति फल की इच्छा और आसक्ति छोड़ देता है, वह कर्म करते हुए भी कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है।

English Meaning:

One whose intellect is unattached everywhere, who has controlled the self and is free from desire, attains the supreme state of freedom from action through renunciation.


🔹 श्लोक 50

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥18-50॥

हिंदी भावार्थ:

हे कुन्तीपुत्र! उस परम सिद्धि को प्राप्त होकर मनुष्य किस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त होता है, यह संक्षेप में मुझसे सुन — वही ज्ञान की परम निष्ठा है।

English Meaning:

Learn from Me briefly how one who has attained perfection reaches Brahman — the supreme goal of knowledge.


🔹 श्लोक 51

बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥18-51॥

हिंदी भावार्थ:

शुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धैर्यपूर्वक मन को संयमित कर, शब्द आदि विषयों का त्याग करके तथा राग और द्वेष को छोड़कर साधक ब्रह्मप्राप्ति की दिशा में अग्रसर होता है।

English Meaning:

Endowed with purified intellect, controlling the self with firmness, abandoning sense objects and giving up attachment and aversion —


🔹 श्लोक 52

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥18-52॥

हिंदी भावार्थ:

जो एकांत का सेवन करने वाला, अल्पाहारी, वाणी-शरीर-मन को वश में रखने वाला तथा नित्य ध्यानयोग में स्थित होकर वैराग्य का आश्रय लेता है —

English Meaning:

Residing in solitude, moderate in eating, controlling speech, body and mind, constantly engaged in meditation and embracing detachment —


🔹 श्लोक 53

अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥18-53॥

हिंदी भावार्थ:

अहंकार, बल का अभिमान, घमंड, काम, क्रोध और संग्रह की भावना को त्यागकर, ममतारहित और शांतचित्त मनुष्य ब्रह्मभाव को प्राप्त होने योग्य बन जाता है।

अर्थात् जब मनुष्य ‘मैं’ और ‘मेरा’ की भावना छोड़ देता है, तब वह परम सत्य में स्थित होने के योग्य बनता है।

English Meaning:

Abandoning ego, arrogance, desire, anger, and possessiveness, becoming free from the sense of ‘mine’ and peaceful, one becomes fit to realize Brahman.


🔹 श्लोक 54

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥18-54॥

हिंदी भावार्थ:

ब्रह्मभाव प्राप्त व्यक्ति न शोक करता है, न इच्छा रखता है; वह समभाव से परम भक्ति पाता है।

English Meaning:

Established in Brahman, serene and equal, one attains supreme devotion.


🔹 श्लोक 55

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥18-55॥

हिंदी भावार्थ:

पराभक्ति से मनुष्य मुझे तत्त्व से जानता है और तत्पश्चात् मुझमें प्रवेश करता है।

English Meaning:

Through devotion one truly knows Me and enters into Me.


🔹 श्लोक 56

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥18-56॥

हिंदी भावार्थ:

जो मनुष्य मेरे आश्रित होकर सभी कर्म करता है, वह मेरी कृपा से शाश्वत और अविनाशी परम पद को प्राप्त करता है।

English Meaning:

He who performs all actions taking refuge in Me attains the eternal and imperishable state by My grace.


🔹 श्लोक 57

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥18-57॥

हिंदी भावार्थ:

अपने सभी कर्म मन से मुझमें अर्पित करके, बुद्धियोग का आश्रय लेकर, सदा मेरा चिंतन कर।

English Meaning:

Mentally dedicating all actions to Me and relying on spiritual wisdom, fix your mind on Me always.


🔹 श्लोक 58

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥18-58॥

हिंदी भावार्थ:

यदि तू मुझमें चित्त लगाएगा तो मेरी कृपा से सभी संकटों को पार कर जाएगा; परंतु यदि अहंकारवश नहीं सुनेगा तो पतन होगा।

English Meaning:

If you fix your mind on Me, you shall overcome all obstacles; but if you act in ego, you will perish.


🔹 श्लोक 59

यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥18-59॥

हिंदी भावार्थ:

यदि तू अहंकार से सोचता है कि युद्ध नहीं करेगा, तो यह तेरा भ्रम है; प्रकृति तुझे कर्म करने को बाध्य करेगी।

English Meaning:

If you think, out of ego, that you will not act, your nature will compel you.


🔹 श्लोक 60

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥18-60॥

हिंदी भावार्थ:

हे कुन्तीपुत्र! अपने स्वभावजन्य कर्म से बँधा हुआ तू मोहवश जो नहीं करना चाहता, वही परवश होकर करेगा।

English Meaning:

Bound by your own nature-born duty, you will act even against your will.


🔹 श्लोक 61

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥18-61॥

हिंदी भावार्थ:

हे अर्जुन! परमेश्वर सबके हृदय में स्थित होकर अपनी माया से सब प्राणियों को यंत्रवत् घुमाता है।

English Meaning:

The Lord dwells in the hearts of all beings, guiding them as if mounted on a machine.


🔹 श्लोक 62

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥18-62॥

हिंदी भावार्थ:

हे भारत! पूर्ण भाव से उसी परमेश्वर की शरण में जा; उसकी कृपा से तू परम शांति और सनातन धाम को प्राप्त करेगा।

English Meaning:

Take refuge in Him alone; by His grace you shall attain supreme peace.


🔹 श्लोक 63

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥18-63॥

हिंदी भावार्थ:

मैंने तुझे अत्यंत गोपनीय ज्ञान कहा; अब इसे विचार कर जैसा उचित समझे, वैसा कर।

English Meaning:

Thus has the most secret knowledge been told; reflect and act as you choose.


🔹 श्लोक 64

सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥18-64॥

हिंदी भावार्थ:

तू मेरा प्रिय है, इसलिए मैं फिर से परम रहस्ययुक्त वचन कहता हूँ।

English Meaning:

Hear again My supreme word, for you are dear to Me.


🔹 श्लोक 65

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥18-65॥

हिंदी भावार्थ:

मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर, मुझे प्रणाम कर — तू मुझे प्राप्त होगा।

English Meaning:

Fix your mind on Me, be devoted, worship and bow to Me; you shall reach Me.


🔹 श्लोक 66 (गीता का परम उपदेश)

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥18-66॥

हिंदी भावार्थ:

सभी धर्मों का त्याग कर मेरी ही शरण में आ जा; मैं तुझे समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा — शोक मत कर।

English Meaning:

Abandon all duties and surrender unto Me alone; I shall liberate you from all sins.


🔹 श्लोक 67

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥18-67॥

हिंदी भावार्थ:

यह गीता का रहस्य किसी भी समय उस व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए जो तपहीन हो, भक्ति रहित हो, सुनने की इच्छा न रखता हो या जो भगवान में दोष दृष्टि रखता हो।

अर्थात् यह दिव्य ज्ञान श्रद्धा और विनम्रता वाले साधकों के लिए है, न कि उपहास या आलोचना करने वालों के लिए।

English Meaning:

This sacred teaching should never be given to one who lacks austerity, devotion, willingness to listen, or who speaks ill of Me.


🔹 श्लोक 68

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥18-68॥

हिंदी भावार्थ:

जो मनुष्य परम प्रेम से इस परम रहस्ययुक्त ज्ञान को मेरे भक्तों में प्रचारित करेगा, वह निस्संदेह मुझे ही प्राप्त होगा।

English Meaning:

One who teaches this supreme secret to My devotees with devotion will surely come to Me.


🔹 श्लोक 69

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥18-69॥

हिंदी भावार्थ:

उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई नहीं है, और भविष्य में भी कोई उससे अधिक प्रिय नहीं होगा।

English Meaning:

Among men, none does dearer service to Me than he, nor shall there be anyone more dear to Me.


🔹 श्लोक 70

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥18-70॥

हिंदी भावार्थ:

जो मनुष्य हमारे इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, वह ज्ञानयज्ञ के द्वारा मेरी पूजा करेगा — ऐसा मेरा मत है।

English Meaning:

He who studies this sacred dialogue worships Me through the sacrifice of knowledge.


🔹 श्लोक 71

श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥18-71॥

हिंदी भावार्थ:

जो मनुष्य श्रद्धा और दोषदृष्टि रहित होकर इस गीता का श्रवण भी करता है, वह भी पापों से मुक्त होकर श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होता है।

English Meaning:

Even one who listens to this with faith and without malice becomes free from sin and attains auspicious realms.



🔹 श्लोक 72

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनंजय ॥18-72॥

हिंदी भावार्थ:

हे अर्जुन! क्या तेरा मोह नष्ट हुआ?


🔹 श्लोक 73 (अर्जुन का उत्तर)

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥18-73॥

हिंदी भावार्थ:

आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हुआ; मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।


🔹 श्लोक 74

सञ्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥18-74॥

हिंदी भावार्थ:

संजय बोले — इस प्रकार मैंने भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण) और महात्मा पार्थ (अर्जुन) के इस अद्भुत और रोमांच उत्पन्न करने वाले संवाद को सुना।

यह संवाद केवल शब्द नहीं था, बल्कि आत्मा को झकझोर देने वाला दिव्य उपदेश था।

English Meaning:

Sanjaya said: Thus I have heard this wonderful and thrilling dialogue between Lord Vasudeva and the noble Arjuna.


🔹 श्लोक 75

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥18-75॥

हिंदी भावार्थ:

महर्षि व्यास की कृपा से मैंने स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण के मुख से यह परम गोपनीय योग सुना।

अर्थात् संजय को दिव्य दृष्टि प्राप्त थी, जिसके कारण वे यह सम्पूर्ण संवाद प्रत्यक्ष सुन सके।

English Meaning:

By the grace of Vyasa, I have heard this supreme and secret yoga directly from Krishna, the Lord of Yoga Himself.


🔹 श्लोक 76

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥18-76॥

हिंदी भावार्थ:

हे राजन् (धृतराष्ट्र)! केशव और अर्जुन के इस पवित्र और अद्भुत संवाद को बार-बार स्मरण करके मैं बार-बार आनंदित हो रहा हूँ।

यह संवाद केवल युद्ध की चर्चा नहीं, बल्कि धर्म और मोक्ष का शाश्वत मार्ग है।

English Meaning:

O King, remembering again and again this sacred and wondrous dialogue between Krishna and Arjuna, I rejoice repeatedly.


🔹 श्लोक 77

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान्राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥18-77॥

हिंदी भावार्थ:

हे राजन्! श्रीहरि के उस अत्यंत अद्भुत विराट रूप को स्मरण करके मुझे महान आश्चर्य होता है और मैं पुनः-पुनः आनंद से भर उठता हूँ।

यहाँ संजय विशेष रूप से उस विराट स्वरूप की स्मृति से उत्पन्न आध्यात्मिक उल्लास का वर्णन करते हैं।

English Meaning:

And remembering again and again the wondrous form of Lord Hari, great is my amazement, O King, and I rejoice again and again.


🔹 श्लोक 78 (अंतिम श्लोक)

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥18-78॥

हिंदी भावार्थ:

जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हैं, वहाँ निश्चित ही विजय, श्री और नीति है।

English Meaning:

Wherever Krishna and Arjuna stand, there are victory and righteousness.


संन्यास और त्याग का तत्त्वज्ञान

अर्जुन भगवान से पूछते हैं कि संन्यास और त्याग में क्या अंतर है। भगवान बताते हैं कि काम्य कर्मों का त्याग संन्यास कहलाता है, जबकि कर्मफल का त्याग ही सच्चा त्याग है।

“सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः”

अर्थात् ज्ञानीजन कर्म का त्याग नहीं, बल्कि फल की आसक्ति का त्याग श्रेष्ठ मानते हैं।

बुद्धि और धृति का विश्लेषण

सात्त्विक बुद्धि सही-असही का स्पष्ट निर्णय करती है।
राजस बुद्धि भ्रमित होती है।
तामस बुद्धि अधर्म को भी धर्म मान लेती है।

सुख भी तीन प्रकार का है —

  • आरंभ में विष, अंत में अमृत (सात्त्विक)
  • आरंभ में अमृत, अंत में विष (राजस)
  • आलस्य और मोह से उत्पन्न (तामस)

स्वधर्म का महत्व

भगवान कहते हैं कि अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करना ही श्रेष्ठ है।

“श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्”

अर्थात् दूसरे के उत्तम कर्म से अपना साधारण कर्म भी श्रेष्ठ है।

गीता का परम उपदेश

“सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज”

यह गीता का सर्वोच्च संदेश है — पूर्ण शरणागति।
भगवान आश्वासन देते हैं कि वे सभी पापों से मुक्त करेंगे।

निष्कर्ष

मोक्षसंन्यासयोग केवल कर्म का त्याग नहीं सिखाता, बल्कि अहंकार और फलासक्ति का त्याग सिखाता है। यह अध्याय जीवन को संतुलित, निःस्वार्थ और ईश्वर-केंद्रित बनाने का मार्ग देता है।


FAQ – गीता अध्याय 18

 

प्रश्न 1: अध्याय 18 में कितने श्लोक हैं?

इस अध्याय में कुल 78 श्लोक हैं।

प्रश्न 2: गीता का अंतिम संदेश क्या है?

“सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज” – पूर्ण शरणागति।

प्रश्न 3: त्याग का सही अर्थ क्या है?

कर्म का नहीं, बल्कि कर्मफल की आसक्ति का त्याग ही सच्चा त्याग है।

Read More : गीता सत्रहवाँ अध्याय (श्रद्धात्रयविभाग योग) – सभी 28 श्लोक, हिंदी भावार्थ और English Meaning


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