🌟 अध्याय 14: गुणत्रयविभाग योग 🌟
श्रीमद्भगवद्गीता – सभी 27 श्लोक हिंदी भावार्थ सहित

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्

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अध्याय 14 गुणत्रयविभाग योग का सार

श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सत्त्व, रजस, तमस् तीन गुणों का विस्तृत वर्णन करते हैं। यह अध्याय प्रकृति के तीन गुणों के स्वरूप, उनके प्रभाव, फलों और उनसे मुक्ति के उपायों को स्पष्ट करता है। गुणत्रयविभाग योग के ज्ञान से जीवात्मा बंधनों से मुक्त होकर परम पद प्राप्त करता है।

श्लोक 1

श्रीभगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥१४।१॥
श्री भगवान बोले- ज्ञानों में भी अतिउत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गए हैं।

श्लोक 2

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥१४।२॥
इस ज्ञान को आश्रय करके मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में भी व्याकुल नहीं होते।

श्लोक 3

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥१४।३॥
हे अर्जुन! मेरी महत्-ब्रह्मरूप मूल-प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है और मैं उस योनि में चेतन गर्भ को स्थापन करता हूँ। उस जड़-चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति होती है।

श्लोक 4

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥१४।४॥
हे अर्जुन! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ उत्पन्न होती हैं, प्रकृति उनकी गर्भधारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापन करने वाला पिता हूँ।

श्लोक 5

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥१४।५॥

हे अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण – ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं।

कठिन शब्द: निबध्नन्ति=बंधते हैं

श्लोक 6

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥१४।६॥
हे निष्पाप! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख और ज्ञान के अभिमान से बाँधता है।

श्लोक 7

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥१४।७॥
हे अर्जुन! रागरूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न जान। वह जीवात्मा को कर्मों के सम्बन्ध में बाँधता है।

श्लोक 8

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥१४।८॥
हे अर्जुन! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न जान। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा द्वारा बाँधता है।

श्लोक 9

सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥१४।९॥
हे अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में लगाता है, रजोगुण कर्म में और तमोगुण ज्ञान को ढँककर प्रमाद में लगाता है।

श्लोक 10

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥१४।१०॥
हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्व और तम को दबाकर रजोगुण, सत्त्व और रज को दबाकर तमोगुण बढ़ता है।

श्लोक 11

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद् विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥१४।११॥
जिस समय इस देह में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है, उस समय सत्त्वगुण बढ़ा हुआ जानना चाहिए।

श्लोक 12

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥१४।१२॥
हे अर्जुन! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, सकाम कर्मों का आरम्भ, अशान्ति और विषय भोगों की लालसा उत्पन्न होती है।

श्लोक 13

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥१४।१३॥
हे अर्जुन! तमोगुण के बढ़ने पर अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मों में अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 14

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकान् मलान्प्राप्नोति शुभ्राः ॥१४।१४॥
जब मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब उत्तम लोकों को प्राप्त होता है।

श्लोक 15

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥१४।१५॥
रजोगुण में मरने पर कर्मसंगी लोगों में और तमोगुण में मरने पर मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।

श्लोक 16

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥१४।१६॥
सत्त्वगुण के कर्म का फल निर्मल स्वर्ग सुख है, रजोगुण का दुःख और तमोगुण का अज्ञान है।

श्लोक 17

सत्त्वात्सुखजने ज्ञानं राजसि लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो बुद्धयः जायन्ते ॥१४।१७॥
सत्त्व से ज्ञान और सुख, रजस से लोभ, तमस से प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 18

उर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥१४।१८॥
सत्त्वगुण वाले ऊपर जाते हैं, रजोगुणी मध्य में रहते हैं, तमोगुणी नीचे गिरते हैं।

श्लोक 19

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥१४।१९॥
जब पुरुष इन गुणों के अतिरिक्त अन्य कर्ता न देखे और गुणों से परे परम तत्त्व को जान ले, तब मेरा स्वरूप प्राप्त करता है।

श्लोक 20

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देवी गुणमयं प्रकृतिम् ।
तंसा मुक्तः सदा जायते मामेति सर्वगुणः ॥१४।२०॥
ये तीनों गुणों को और गुणमयी प्रकृति को अति त्यागकर मुक्त हो जाता है और मुझको प्राप्त होता है।

श्लोक 21

माम् च योऽव्यभिचारेण भक्त्या युघः सर्वगुणः ।
स तत् परं पुरुषं मां नोपजायति देहभृत् ॥१४।२१॥
जो अव्यभिचारी भक्त मेरी शरण में जाता है, वह इन गुणों से परे परम पुरुष मुझको प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 22

अहमेवाक्षरं परं गुणेभ्योऽऽतिवर्तते ।
भूतः प्रकृतिमाश्रित्य भूतभावेन कौन्तेय ॥१४।२२॥
हे अर्जुन! मैं ही अक्षर परम तत्त्व हूँ जो इन गुणों से परे है। भूत प्रकृति को आश्रय करके भूतभाव से रहते हैं।

श्लोक 23

भूतभावोद्धवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ।
तस्य हेतुरहम् कौन्तेय गुणसङ्ख्याने वार्तते ॥१४।२३॥
भूतों का भावोद्भव करने वाला विसर्ग कर्म कहलाता है। उसके हेतु मैं हूँ, गुणसङ्ख्याने में कहा गया है।

श्लोक 24

गुणभेदविजान् सर्वान् प्रकृत्यैव गुणैः समा ।
न पङ्क्तिप्रभ्ययुङ्क्तो माम् निर्बन्धः कृत्स्थायिनः ॥१४।२४॥
सभी गुणों के भेदों को जानकर प्रकृति के गुणों से सम रहने वाला न बँधता है। वह स्थिर रहता है।

श्लोक 25

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संतुष्टः स्वकर्मणि ॥१४।२५॥
शत्रु मित्र, मान अपमान, शीतोष्ण, सुख दुःख में सम रहने वाला अपने कर्मों में संतुष्ट रहता है।

श्लोक 26

असक्तः सर्वभूतानाम् मध्यस्थं दृष्टयात्मनि ।
अभिनिविष्टोऽपि तत् प्राप्य मां नोपजायति ॥१४।२६॥
सभी भूतों में आसक्तिरहित, आत्मा में दृष्टि रखने वाला मुझको प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 27

इति ते संपरम गुह्यं गुणत्रयविभागयोगम् ।
प्रोक्तः प्रोक्तं च यः श्रुणुयात् स सर्वपातकैः प्रमुच्यते ॥१४।२७॥
इस प्रकार गुणत्रयविभाग योग का परम रहस्य कहा। जो इसका श्रवण करेगा, वह सर्व पापों से मुक्त हो जायेगा।

  प्रमुख कठिन शब्दार्थ

  • गुणत्रय: सत्त्व, रजस, तमस् तीन गुण
  • महत् ब्रह्म: मूल प्रकृति
  • निबध्नन्ति: बाँधते हैं, बन्धन करते हैं
  • प्रमाद: व्यर्थ चेष्टा
  • संजयति: लगाता है, प्रवृत्त करता है
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गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक: पुरुषोत्तमयोगः (पुरुषोत्तमयोग)


 

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 14 – गुणत्रयविभाग योग

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 14 गुणत्रयविभाग योग सृष्टि में कार्यरत तीन गुणों — सत्त्व, रजस और तमस — का गहन वर्णन करता है। भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न होकर जीवात्मा को संसार के बंधन में बाँधते हैं।

इस अध्याय में यह स्पष्ट किया गया है कि सत्त्व गुण शुद्धता और ज्ञान प्रदान करता है, रजस कर्म और इच्छा को उत्पन्न करता है, जबकि तमस अज्ञान और आलस्य को बढ़ाता है। जो साधक इन तीनों गुणों से ऊपर उठ जाता है, वही वास्तविक मुक्ति प्राप्त करता है।


 महत्वपूर्ण FAQs – अध्याय 14 गुणत्रयविभाग योग

1. गुणत्रयविभाग योग का मुख्य विषय क्या है?

इस अध्याय का मुख्य विषय प्रकृति के तीन गुण — सत्त्व, रजस और तमस — तथा उनके प्रभाव का वर्णन है।

2. सत्त्व, रजस और तमस क्या हैं?

ये तीनों प्रकृति के मूल गुण हैं जो मनुष्य के विचार, व्यवहार और कर्म को प्रभावित करते हैं।

3. सत्त्व गुण का क्या प्रभाव होता है?

सत्त्व गुण शुद्धता, ज्ञान, संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।

4. रजस और तमस के लक्षण क्या हैं?

रजस इच्छा, आसक्ति और कर्म में व्यस्तता उत्पन्न करता है, जबकि तमस अज्ञान, आलस्य और मोह को बढ़ाता है।

5. गुणों से परे कैसे जाया जा सकता है?

अनन्य भक्ति, आत्मज्ञान और समभाव के माध्यम से साधक तीनों गुणों से ऊपर उठ सकता है।

6. अध्याय 14 का जीवन में क्या महत्व है?

यह अध्याय हमें अपने स्वभाव और व्यवहार को समझने में सहायता करता है तथा आत्मविकास का मार्ग दिखाता है।


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