श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 – विश्वरूप दर्शन योग

सभी श्लोक हिन्दी अर्थ सहित

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 : विश्वरूप दर्शन योग में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखाया। इस अध्याय में भगवान की सर्वव्यापकता, महिमा और दिव्य स्वरूप का वर्णन है। यह अध्याय हमें भगवान की सर्वशक्तिमत्ता और उनकी दिव्यता को समझने में मदद करता है।

श्लोक 1

अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम॥

Arjuna Uvacha
Mad-anugrahaya paramam guhyam adhyatma-samjnitam,
Yat tvayoktam vachas tena moho ’yam vigato mama.

हिन्दी अर्थ: अर्जुन ने कहा: आपने मेरी कृपा के लिए जो अत्यंत गोपनीय और अध्यात्म ज्ञान का वचन कहा, उससे मेरा यह मोह दूर हो गया है।

श्लोक 2

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥

Bhavapyayau hi bhutanam shrutau vistarasho maya,
Tvattah kamala-patraksha mahatmyam api chavyayam.

हिन्दी अर्थ: हे कमलनयन! मैंने आपसे सभी प्राणियों के उत्पत्ति और विनाश के बारे में विस्तार से सुना है और आपके अविनाशी महात्म्य को भी जाना है।

श्लोक 3

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥

Evam etad yathattha tvam atmanam parameshvara,
Drashtum ichchhami te rupam aishvaram purushottama.

हिन्दी अर्थ: हे पुरुषोत्तम! हे परमेश्वर! जैसा आपने अपने आप को बताया है, वैसा ही मैं आपके दिव्य रूप को देखना चाहता हूँ।

श्लोक 4

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्॥

Manyase yadi tach chakyam maya drashtum iti prabho,
Yogeshvara tato me tvam darshayatmanam avyayam.

हिन्दी अर्थ: हे प्रभो! हे योगेश्वर! यदि आप समझते हैं कि मैं इसे देखने योग्य हूँ, तो कृपा करके मुझे अपना अविनाशी स्वरूप दिखाइए।

श्लोक 5

श्री भगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥

Shri Bhagavan Uvacha
Pashya me partha rupani shatasho ’tha sahasrashah,
Nana-vidhani divyani nana-varnakritini cha.

हिन्दी अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण ने कहा: हे पार्थ! मेरे सैकड़ों-हज़ारों दिव्य, विविध रंग और आकृतियों वाले रूपों को देखो।

श्लोक 6

पश्यादित्यान् वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥

Pashyadityan vasun rudran ashvinau marutas tatha,
Bahuni adrishta-purvani pashyashcharyani bharata.

हिन्दी अर्थ: हे भारत! आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, अश्विनीकुमारों और मरुतों को देखो। बहुत से पहले कभी न देखे गए आश्चर्यजनक दृश्य भी देखो।

श्लोक 7

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्।
मम देहे गुडाकेश यच्छान्यद् द्रष्टुमिच्छसि॥

Ihaikastham jagat kritsnam pashyadya sacharacharam,
Mama dehe gudakesha yach chanyad drashtum ichchhasi.

हिन्दी अर्थ: हे गुडाकेश! इस समय मेरे इस एक देह में ही समस्त चराचर जगत् को देखो, और जो कुछ और देखना चाहते हो, वह भी देखो।

श्लोक 8

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥

Na tu mam shakyase drashtum anenaiva svachakshusha,
Divyam dadami te chakshuh pashya me yogamaishvaram.

हिन्दी अर्थ: तुम अपने इन सामान्य नेत्रों से मुझे नहीं देख सकते। मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूँ, मेरे योगमय ईश्वरीय स्वरूप को देखो।

श्लोक 9

संजय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्॥

Sanjaya Uvacha
Evam uktva tato rajan mahayogeshvaro harih,
Darshayamasa parthaya paramam rupam aishvaram.

हिन्दी अर्थ: संजय ने कहा: हे राजा! ऐसा कहकर महायोगेश्वर भगवान हरि ने अर्जुन को अपना परम ईश्वरीय रूप दिखाया।

श्लोक 10

अनेकवक्त्रनयनं अनेकाद्भुतदर्शनम्।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्॥

Aneka-vaktra-nayanam aneka-dbhuta-darshanam,
Aneka-divyabharanam divyaneko-dyatayudham.

हिन्दी अर्थ: उस रूप में अनेक मुख और नेत्र थे, अनेक आश्चर्यजनक दृश्य थे, अनेक दिव्य आभूषण थे और अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र उठाए हुए थे।

श्लोक 11

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्॥

Divya-malyambara-dharam divya-gandhanulepanam,
Sarvashcharyamayam devam anantam vishvatomukham.

हिन्दी अर्थ: वह देव दिव्य माला और वस्त्र धारण किए हुए थे, दिव्य गंध और लेप से युक्त थे। वह सर्वाश्चर्यमय, अनंत और सर्वमुख थे।

श्लोक 12

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥

Divi surya-sahasrasya bhaved yugapad utthita,
Yadi bha sadrisi sa syad bhasas tasya mahatmanah.

हिन्दी अर्थ: यदि एक साथ हज़ारों सूर्य आकाश में उदित हों, तो भी उस महात्मा के तेज के समान प्रकाश नहीं हो सकता।

श्लोक 13

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥

Tatraikastham jagat kritsnam pravibhaktam anekadha,
Apshyad devadevasya shareere pandavas tada.

हिन्दी अर्थ: वहाँ पांडवों ने देवों के देव के एक शरीर में ही समस्त जगत् को अनेक प्रकार से विभक्त होकर देखा।

श्लोक 14

ततः स विस्मयाविष्टो हृषितो रोमहर्षणः।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥

Tatah sa vismayavishto hrishito romaharshanah,
Pranamya shirasa devam kritanjalirabhashata.

हिन्दी अर्थ: तब अर्जुन आश्चर्य से भरे, रोमांचित और प्रसन्न होकर सिर झुकाकर अंजलि बंधाकर भगवान से बोलने लगे।

श्लोक 15

अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्॥

Arjuna Uvacha
Pashyami devams tava deva dehe sarvams tatha bhuta-vishesh-sanghan,
Brahmanam ishkam kamalasana-stham rishimsh cha sarvan uragan divyan.

हिन्दी अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे देव! आपके इस दिव्य शरीर में मैं सभी देवताओं को, सभी विशेष प्रकार के प्राणियों के समूह को, ब्रह्मा जी को कमलासन पर बैठे हुए, सभी ऋषियों और दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ।

श्लोक 16

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥

Aneka-bahudara-vaktra-netram pashyami tvam sarvato ’nantarupam,
Nantam na madhyam na punas tavadim pashyami vishveshvara vishvarupa.

हिन्दी अर्थ: हे विश्वेश्वर! हे विश्वरूप! मैं आपको अनेक भुजाओं, उदरों, मुखों और नेत्रों वाले, सर्वत्र व्याप्त और अनंत रूप वाले देख रहा हूँ। मैं आपके न तो अंत देखता हूँ, न मध्य और न ही आदि।

श्लोक 17

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥

Kiritinam gadinam chakrinam cha tejorashim sarvato diptimantam,
Pashyami tvam durnirikshyam samantad diptanalarkadyutim aprameyam.

हिन्दी अर्थ: मैं आपको मुकुटधारी, गदाधारी, चक्रधारी और तेजःपुंज के रूप में देख रहा हूँ, जो सर्वत्र प्रकाशमान हैं। आपका यह रूप अत्यंत तेजस्वी और अग्नि-सूर्य के समान प्रकाशमान है, जिसे देखना कठिन है।

श्लोक 18

त्वमक्षरं परमं वेद्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥

Tvam aksharam paramam vedyam tvam asya vishvasya param nidhanam,
Tvam avyayah shashvata-dharma-gopta sanatanas tvam purusho mato me.

हिन्दी अर्थ: आप ही अक्षर, परम वेद्य और इस विश्व के परम निधान हैं। आप अविनाशी, शाश्वत धर्म के रक्षक और सनातन पुरुष हैं, ऐसा मेरा मत है।

श्लोक 19

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्॥

Anadi-madhyantam ananta-viryam ananta-bahum shashi-surya-netram,
Pashyami tvam dipta-hutasha-vaktra svatejasa vishvam idam tapantam.

हिन्दी अर्थ: मैं आपको आदि-मध्य-अंत रहित, अनंत वीर्य और अनंत भुजाओं वाले, चन्द्रमा-सूर्य के समान नेत्रों वाले और अपने तेज से इस विश्व को तपाने वाले अग्निमुख के समान देख रहा हूँ।

श्लोक 20

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्॥

Dyava-prithivyor idam antaram hi vyaptam tvayaikena dishash cha sarvah,
Drishtvadbhutam rupam ugram tavedam lokatrayam pravyathitam mahatman.

हिन्दी अर्थ: हे महात्मन! आप एक ही इस आकाश और पृथ्वी के बीच के समस्त अंतराल और सभी दिशाओं को व्याप्त किए हुए हैं। आपके इस भयानक और आश्चर्यजनक रूप को देखकर तीनों लोक व्याकुल हो गए हैं।

श्लोक 21

अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति स्वस्तीत्युक्त्वा।
महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिस्त्वामरर्षिभिरुद्गीतैः॥

Ami hi tvam surasangha vishanti kechid bhitah pranjalayo grinanti svastity uktva,
Maharshisiddha-sanghah stuvanti tvam stutibhih pushkalabhis tvam ararshibhir udgitaih.

हिन्दी अर्थ: देवताओं के समूह आपके भीतर प्रवेश कर रहे हैं, कुछ भयभीत होकर अंजलि बंधाए हुए ‘स्वस्ति’ कह रहे हैं। महर्षि और सिद्धगण आपकी बहुत-सी स्तुतियों से आपकी स्तुति कर रहे हैं।

श्लोक 22

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वे अश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥

Rudraditya vasavo ye cha sadhya vishve ashvinau marutash choshmapash cha,
Gandharva-yaksha-asura-siddha-sangha vikshante tvam vismitash chaiva sarve.

हिन्दी अर्थ: रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुत, उष्मापा, गंधर्व, यक्ष, असुर और सिद्धगण सभी आश्चर्यचकित होकर आपका दर्शन कर रहे हैं।

श्लोक 23

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरूपादम्।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्॥

Rupam mahatte bahu-vaktra-netram maha-baho bahu-bahurupadam,
Bahudaram bahu-damshtra-karalam drishtva lokah pravyathitas tathaham.

हिन्दी अर्थ: हे महाबाहो! आपके इस महान रूप को, जो अनेक मुख, नेत्र, भुजाएँ, उदर, दांत और भयानक है, देखकर सभी लोक और मैं भी व्याकुल हो गए हैं।

श्लोक 24

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥

Nabhasprisham diptam aneka-varnam vyattananan dipta-vishala-netram,
Drishtva hi tvam pravyathitantaratma dhritim na vindami shamam cha vishno.

हिन्दी अर्थ: हे विष्णो! आपके इस आकाश को स्पर्श करने वाले, अनेक रंगों वाले, खुले मुख और दिप्त विशाल नेत्रों वाले रूप को देखकर मेरा हृदय व्याकुल हो गया है। मैं न तो धैर्य पा रहा हूँ और न ही शांति।

श्लोक 25

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानी दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥

Damshtra-karalani cha te mukhani drishtvaiva kalanala-sannibhani,
Disho na jane na labhe cha sharma prasida devesha jagannivasa.

हिन्दी अर्थ: हे जगन्निवास! हे देवेश! आपके कालानल के समान भयानक दांतों वाले मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं पहचान पा रहा हूँ और न ही मुझे शांति मिल रही है। कृपा करके प्रसन्न होइए।

श्लोक 26

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥

Ami cha tvam dhritarashtrasya putrah sarve sahaivavanipala-sanghaih,
Bhishmo dronah sutaputras tathasau saha-asmadiyair api yodha-mukhaih.

हिन्दी अर्थ: धृतराष्ट्र के सभी पुत्र, सभी राजा और भीष्म, द्रोण, कर्ण तथा हमारे प्रमुख योद्धा सभी आपके भीतर प्रवेश कर रहे हैं।

श्लोक 27

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानी।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदीप्यमाना नगरान्तरेषु॥

Vaktrani te tvaramana vishanti damshtra-karalani bhayanakani,
Kechid vilagna dashanantareshu sandipyamana nagarantareshu.

हिन्दी अर्थ: आपके भयानक दांतों वाले मुखों में वे तेज़ी से प्रवेश कर रहे हैं। कुछ आपके दांतों के बीच में फँसे हुए हैं और उनके सिर प्रकाशमान हो रहे हैं।

श्लोक 28

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥

Yatha nadinam bahavo ’mbuvegah samudram evabhimukha dravanti,
Tatha tavami nara-loka-vira vishanti vaktrani abhivijvalanti.

हिन्दी अर्थ: जैसे नदियाँ समुद्र की ओर तेज़ी से बहती हैं, वैसे ही नरलोक के वीर आपके प्रकाशमान मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

श्लोक 29

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः।
तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥

Yatha pradiptam jvalanam patanga vishanti nashaya samriddha-vegah,
Tathaiva nashaya vishanti lokas tavapi vaktrani samriddha-vegah.

हिन्दी अर्थ: जैसे तेज़ी से उड़ते हुए पतंगे जलती हुई अग्नि में अपने विनाश के लिए प्रवेश करते हैं, वैसे ही सभी लोक तेज़ी से आपके मुखों में अपने विनाश के लिए प्रवेश कर रहे हैं।

श्लोक 30

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥

Lelihyase grasamanah samantal lokan samagran vadanair jvaladbhih,
Tejobhir apurya jagat samagram bhasas tavogra pratapanti vishno.

हिन्दी अर्थ: हे विष्णो! आप अपने प्रकाशमान मुखों से समस्त लोकों को चारों ओर से चाट रहे हैं। आपके तेज से समस्त जगत् प्रकाशित हो रहा है और आपके उग्र प्रकाश से तप रहा है।

श्लोक 31

आख्याहि मे को भवानुग्रो रूपो महद्योगेश्वर।
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यम्॥

Akhyahi me ko bhavan ugro rupo mahad yogeshvara,
Namo ’stu te devavara prasida vijnatum ichchhami bhavantam adyam.

हिन्दी अर्थ: हे महायोगेश्वर! हे देववर! आपका यह भयानक रूप कौन है? मैं आपको नमस्कार करता हूँ, कृपा करके प्रसन्न होइए। मैं आपके इस आद्य स्वरूप को जानना चाहता हूँ।

श्लोक 32

श्री भगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥

Shri Bhagavan Uvacha
Kalo ’smi lokakshaya-krit pravriddho lokan samahartum iha pravrittah,
Rite ’pi tvam na bhavishyanti sarve ye ’vasthitah pratyanikeshu yodhah.

हिन्दी अर्थ: भगवान ने कहा: मैं ही काल हूँ, लोकों का विनाश करने वाला, अब मैं यहाँ लोकों का संहार करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। बिना तुम्हारे भी ये सभी योद्धा, जो शत्रु पक्ष में खड़े हैं, नहीं रहेंगे।

श्लोक 33

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥

Tasmat tvam utthishta yasho labhasva jitva shatrun bhunkshva raajyam samriddham,
Mayaivaite nihata purvam eva nimittamatram bhavavyasachin.

हिन्दी अर्थ: इसलिए तुम उठो, यश प्राप्त करो, शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य का भोग करो। इनका विनाश मैंने पहले ही कर दिया है, तुम केवल निमित्त मात्र हो।

श्लोक 34

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्।
मया हतांस्त्वं जही मा व्यथिष्ठाः युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्॥

Dronam cha bhishmam cha jayadratham cha karnam tathanyan api yodha-virn,
Maya hatams tvam jahi ma vyathishthah yudhyasva jetasi rane sapatnan.

हिन्दी अर्थ: द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और अन्य वीर योद्धाओं को मैंने ही मार डाला है। तुम उन्हें मारो और व्याकुल मत होओ। युद्ध करो, तुम शत्रुओं को जीतोगे।

श्लोक 35

सञ्जय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिवेपमानः किरीटी।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥

Sanjaya Uvacha
Etach chrutva vachanam keshavasya kritanjali vepamanah kiriti,
Namaskritva bhuyah evaha krishnam sagadgadam bhita-bhito pranamya.

हिन्दी अर्थ: संजय ने कहा: भगवान केशव के इस वचन को सुनकर अर्जुन ने अंजलि बंधाई, काँपते हुए, सिर झुकाकर और डरते-डरते पुनः नमस्कार किया और गद्गद स्वर में भगवान कृष्ण से बोला।

श्लोक 36

अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकाशं जगत्प्रदीपमनप्रमेयम्।
योगेश्वरं जगत्स्वामिनं प्रसीदास्मि देवनमीड्यम्॥

Arjuna Uvacha
Sthane hrishikesh tava prakasham jagat-pradeepam anaprameyam,
Yogeshvaram jagat-svaminam prasidasmi devanam idyam.

हिन्दी अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे हृषीकेश! आपका यह प्रकाश, जो जगत् का दीपक और अप्रमेय है, फिर से स्थापित हो। हे योगेश्वर! हे जगत् के स्वामी! हे देवों के पूज्य! कृपा करके प्रसन्न होइए।

श्लोक 37

कचं दयितं निःशेषेणाध्यात्मबुद्ध्या त्वमाद्यः।
अस्मे कथयाशु यथेप्सितं वेत्सि त्वामाद्यदेवम्॥

Kacham dayitam nihsheshena adhyatma-buddhya tvam adyah,
Asme kathayashu yathepsitam vetsi tvam adya-devam.

हिन्दी अर्थ: आप ही आद्य देव हैं, यह मैं पूर्ण रूप से अध्यात्म बुद्धि से जानता हूँ। कृपा करके मुझे वह बताइए, जो आप मुझे बताना चाहते हैं।

श्लोक 38

देवापि यदा त्वामहं सा वाचो नार्हति त्वद्विरहिताः।
स्थाने हृषीकेश तव प्रकाशो जगत्प्रदीपः॥

Deva api yada tvam aham sa vacho narhati tvad-virahitah,
Sthane hrishikesh tava prakasho jagat-pradeepah.

हिन्दी अर्थ: हे हृषीकेश! जब आप नहीं होते, तब देवता भी आपकी स्तुति करने योग्य नहीं होते। आपका प्रकाश ही जगत् का दीपक है।

श्लोक 39

यथा प्रदीप्तो ज्वलनोऽप्ययस्योस्तीर्थं प्राप्य स्वयमेव शान्त्युपैति।
तथा ममाप्युत्सृज्यमाने प्राणे संविशन्त्युष्णीषि देहगताः॥

Yatha pradipto jvalano ’py ayasyostirtha prapy svayam eva shanty upaiti,
Tatha mamapy utsrijyamane prane samvishanty ushnishi deha-gatah.

हिन्दी अर्थ: जैसे जलती हुई लकड़ी जलने के बाद शांत हो जाती है, वैसे ही जब आप प्राणों को छोड़ देते हैं, तो ये देह में स्थित प्राण आपके ही उष्णीष में समा जाते हैं।

श्लोक 40

नमस्तस्तु महाबाहो विश्वरूपाय विश्वेश्वराय।
नमस्ते जोयसम्पूर्णमंगलाय नमो नमः॥

Namah tastu maha-baho vishvarupaya vishveshvaraya,
Namah te joya-sampurnam-angalaya namo namah.

हिन्दी अर्थ: हे महाबाहो! हे विश्वरूप! हे विश्वेश्वर! आपको बार-बार नमस्कार है। हे पूर्ण आनंद और मंगलमय! आपको बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 41

श्री भगवानुवाच
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥

Shri Bhagavan Uvacha
Iti te jnanam akhyatam guhyad guhyataram maya,
Vimrishyaitad asheshena yathechchhasi tatha kuru.

हिन्दी अर्थ: भगवान ने कहा: मैंने तुम्हें यह अत्यंत गोपनीय ज्ञान बताया है। इसे पूर्ण रूप से विचार करके तुम जो चाहो, वैसा करो।

श्लोक 42

अर्जुन उवाच
इति मत्वा भयात्प्राणम्यावस्य त्वदलोकात्।
प्रसादयेऽकुतोभयम् कृष्णमूढमेतद्वचः॥

Arjuna Uvacha
Iti matva bhayat pranam yavasya tvad-alokat,
Prasadayekutobhayam krishnam mudham etad vachah.

हिन्दी अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! आपसे दूर रहने पर मैं भयभीत हो गया हूँ। कृपा करके मुझे निर्भय कीजिए। मेरा यह वचन मूर्खतापूर्ण है।

श्लोक 43

पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्राभव॥

Pitasi lokasya characharasya tvam asya pujyash cha gurur gariyan,
Na tvat-samo ’sty abhyadhikah kuto ’nyo lokatraye ’py apratima-prabhava.

हिन्दी अर्थ: आप इस चराचर जगत् के पिता हैं, आप पूज्य और महान गुरु हैं। तीनों लोकों में भी आपसे बड़ा कोई नहीं है। आप अद्वितीय और अप्रमेय हैं।

श्लोक 44

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥

Tasmat pranamya pranidhaya kayam prasadaye tvam aham ishameedyam,
Piteva putrasya sakheva sakhyuh priyah priyayarhasi deva sodhum.

हिन्दी अर्थ: इसलिए मैं आपको नमस्कार करता हूँ और शरीर को झुकाकर आपसे क्षमा याचना करता हूँ। हे देव! आप पिता के समान, पुत्र के समान, सखा के समान और प्रिय के समान हैं, इसलिए आप मुझे क्षमा कर सकते हैं।

श्लोक 45

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे।
तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥

Adrishta-purvam hrishito ’smi drishtva bhayena cha pravyathitam mano me,
Tadeva me darshaya deva rupam prasida devesha jagannivasa.

हिन्दी अर्थ: हे देवेश! हे जगन्निवास! मैंने पहले कभी न देखा गया यह रूप देखकर मैं प्रसन्न भी हूँ और भय से मेरा मन व्याकुल भी है। कृपा करके मुझे वही रूप दिखाइए।

श्लोक 46

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥

Kiritinam gadinam chakrinam cha tejorashim sarvato diptimantam,
Pashyami tvam durnirikshyam samantad diptanalarkadyutim aprameyam.

हिन्दी अर्थ: मैं आपको मुकुटधारी, गदाधारी, चक्रधारी और तेजःपुंज के रूप में देख रहा हूँ, जो सर्वत्र प्रकाशमान हैं। आपका यह रूप अत्यंत तेजस्वी और अग्नि-सूर्य के समान प्रकाशमान है, जिसे देखना कठिन है।

श्लोक 47

श्री भगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदम् रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥

Shri Bhagavan Uvacha
Maya prasannena tvarjunedam rupam param darshitam atma-yogat,
Tejo-mayam vishvam anantam adyam yan me tvad anyena na drishtapurvam.

हिन्दी अर्थ: भगवान ने कहा: हे अर्जुन! मैं तुम्हारे प्रति प्रसन्न होकर अपने योगमय बल से यह परम, तेजोमय, विश्वरूप, अनंत और आद्य रूप दिखा रहा हूँ, जिसे तुमने पहले कभी नहीं देखा।

श्लोक 48

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥

Na vedayajna-adhyanair na danair na kriyabhir na tapobhir ugrai,
Evam-rupah shakya aham nr-loke drashtum tvad anyena kuru-pravira.

हिन्दी अर्थ: हे कुरुप्रवीर! वेद, यज्ञ, अध्ययन, दान, क्रिया और कठोर तप से भी इस प्रकार का मेरा रूप मनुष्य लोक में तुमसे अन्य कोई नहीं देख सकता।

श्लोक 49

मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥

Ma te vyatha ma cha vimudha-bhavo drishtva rupam ghoram idring mamedam,
Vyapeta-bhih pritamanah punas tvam tadeva me rupam idam prapashya.

हिन्दी अर्थ: इस मेरे भयानक रूप को देखकर तुम्हें व्यथा या मोह न हो। भय रहित और प्रसन्न मन होकर पुनः मेरा यह रूप देखो।

श्लोक 50

सञ्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः।
आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥

Sanjaya Uvacha
Ity arjunam vasudevas tathoktva svakam rupam darshayamasa bhuyah,
Ashvasayamasa cha bhitam enam bhutva punah saumya-vapur maha-atma.

हिन्दी अर्थ: संजय ने कहा: इस प्रकार अर्जुन से कहकर भगवान वासुदेव ने पुनः अपना सौम्य रूप दिखाया और महात्मा भगवान ने उसे भय से मुक्त करके आश्वस्त किया।

श्लोक 51

अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकाशते॥

Arjuna Uvacha
Drishtvedam manusham rupam tava saumyam janardana,
Idanim asmi samvrittah sachetah prakashate.

हिन्दी अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे जनार्दन! आपके इस सौम्य मानव रूप को देखकर अब मैं संतुलित और सचेत हो गया हूँ।

श्लोक 52

श्री भगवानुवाच
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्न मे।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥

Shri Bhagavan Uvacha
Sudurdarsham idam rupam drishtavan asi yan me,
Deva apy asya rupasya nityam darshanakankshinah.

हिन्दी अर्थ: भगवान ने कहा: तुमने मेरा यह अत्यंत दुर्लभ रूप देखा है, जिसे देवता भी सदा देखने की इच्छा रखते हैं।

श्लोक 53

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया।
शक्य एवम्विधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥

Naham vedair na tapasa na danena na chejyaya,
Shakya evam-vidho drashtum drishtavan asi mam yatha.

हिन्दी अर्थ: वेद, तप, दान या यज्ञ से भी मुझे इस प्रकार नहीं देखा जा सकता, जैसा तुमने देखा है।

श्लोक 54

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवं-विधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥

Bhaktya tvananyaya shakya aham evam-vidho ’rjuna,
Jnatum drashtum cha tattvena praveshtum cha parantapa.

हिन्दी अर्थ: हे परंतप! मुझे इस प्रकार जानने, देखने और तत्त्व से प्रवेश करने के लिए केवल अनन्य भक्ति से ही संभव है।

श्लोक 55

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥

Mattah parataram nanyat kinchid asti dhananjaya,
Mayi sarvam idam protam sutre mani-gana iva.

हिन्दी अर्थ: हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। यह सारा विश्व मुझमें इसी प्रकार गूंथा हुआ है, जैसे धागे में मणियाँ।

उपसंहार

श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय, विश्वरूप दर्शन योग में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखाया। इस अध्याय में भगवान की सर्वव्यापकता, महिमा और दिव्य स्वरूप का वर्णन है। यह अध्याय हमें भगवान की सर्वशक्तिमत्ता और उनकी दिव्यता को समझने में मदद करता है। भगवान का यह रूप अत्यंत दुर्लभ है और इसे केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है। इस अध्याय को पढ़कर हम भगवान की महिमा को समझ सकते हैं और उनकी भक्ति में लीन हो सकते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 12: भक्ति योग

आगे के अध्याय में, भगवान श्रीकृष्ण भक्ति योग के बारे में बताते हैं। अध्याय 12 पढ़ें और भक्ति के मार्ग को समझें।

 


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