
श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 1
अर्जुन विषाद योग

📖 श्लोक सूची
| श्लोक संख्या | वक्ता | मुख्य विषय |
|---|---|---|
| 1-11 | धृतराष्ट्र/दुर्योधन | सेनाओं का वर्णन |
| 12-19 | भीष्म/पांडव | शंखनाद |
| 20-47 | अर्जुन/संजय | अर्जुन का विषाद |
श्लोक 1
धृतराष्ट्र उवाच |
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥१॥
धृतराष्ट्र बोले – हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्रित हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु पुत्रों ने क्या किया?
Dhritarashtra said: O Sanjaya! Assembled on the sacred field of Kurukshetra, eager to fight, what did my sons and Pandu’s sons do?
श्लोक 2
सञ्जय उवाच |
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥२॥
संजय बोले – उस समय दुर्योधन ने पाण्डव सेना को सुव्यवस्थित देखकर अपने आचार्य द्रोण के पास जाकर वचन कहा।
Sanjaya said: Seeing the Pandava army arrayed in battle formation, King Duryodhana then approached his teacher and spoke these words.
श्लोक 3
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३॥
हे आचार्य! पाण्डुपुत्रों की इस विशाल चमू को देखो जो आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न ने व्यूह रचना की है।
O teacher! Behold the great army of the sons of Pandu, so expertly arrayed by your intelligent disciple, the son of Drupada.
श्लोक 4
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥४॥
यहाँ भीम-अर्जुन के समान युद्ध करने वाले महान धनुर्धर शूरवीर युयुधान (सात्यकि), विराट और महारथी द्रुपद हैं।
Here are heroes, mighty archers equal to Bhima and Arjuna, Yuyudhana, Virata, and the great chariot-warrior Drupada.
श्लोक 5
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥५॥
धृष्टकेतु, चेकितान, वीर्यवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और श्रेष्ठ नरश्रेष्ठ शैब्य।
Dhrishtaketu, Chekitana, valiant king of Kashi, Purujit, Kuntibhoja, and Shaibya—the best of men.
श्लोक 6
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥६॥
पराक्रमी युधामन्यु, शक्तिशाली उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु और द्रौपदी पुत्र सभी महारथी हैं।
The mighty Yudhamanyu, valiant Uttamouja, Subhadra’s son, and Draupadi’s sons—all great chariot-warriors.
श्लोक 7
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥७॥
हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! हमारी सेना के प्रधान नायकों को जान लीजिए। आपकी जानकारी हेतु उनका नाम लेता हूँ।
O best of Brahmins! Know also our principal warriors. For your information, I shall name the commanders of my army.
श्लोक 8
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥८॥
आप स्वयं, भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त पुत्र भूरिश्रवा।
Yourself, Bhishma, Karna, Kripa—victorious in battle, Ashwatthama, Vikarna, and Somadatta’s son.
श्लोक 9
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥९॥
और भी अनेक शूरवीर हैं जो मेरे लिए प्राण त्यागने को तैयार हैं। सभी युद्ध निपुण हैं।
Many other brave heroes skilled in war, ready to lay down their lives for me, armed with various weapons.
श्लोक 10
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥१०॥
भीष्म द्वारा संरक्षित हमारी सेना अपरिमित है, भीम द्वारा संरक्षित उनकी सेना सीमित है।
Our army protected by Bhishma is limitless, while theirs protected by Bhima is limited.
श्लोक 11
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥११॥
सभी अपनी-अपनी स्थिति में रहकर भीष्म की रक्षा करें।
Therefore all of you stationed in your respective positions, protect Bhishma alone.
श्लोक 12
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंखं दध्मौ प्रतापवान् ॥१२॥
कुरुवृद्ध पितामह भीष्म ने दुर्योधन को हर्षित कर सिंहनाद के साथ शंख बजाया।
Then Bhishma, the grandsire of Kurus, roared like a lion and blew his conch to cheer Duryodhana.
श्लोक 13
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥१३॥
तब शंख, भेरी, पणव, ढोल, नगाड़े और गोमुख एक साथ बज उठे। वह शब्द भयंकर हो गया।
Then conches, kettledrums, cymbals, drums and trumpets suddenly sounded together. That uproar was tumultuous.
श्लोक 14
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥१४॥
तब सफेद घोड़ों से जुते विशाल रथ पर खड़े माधव (कृष्ण) और पांडव (अर्जुन) ने दिव्य शंख बजाए।
Then stationed on a magnificent chariot yoked with white horses, Madhava and Pandava blew divine conches.
श्लोक 15
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥१५॥
हृषीकेश (कृष्ण) ने पाञ्चजन्य, धनंजय (अर्जुन) ने देवदत्त, वृकोदर भीम ने पौण्ड्र महाशंख बजाया।
Hrishikesh blew Panchajanya, Dhananjaya blew Devadatta, and Bhima of terrible deeds blew Paundra.
श्लोक 16
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥१६॥
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय, नकुल ने सुघोष, सहदेव ने मणिपुष्पक बजाया।
King Yudhishthira son of Kunti blew Anantavijaya, Nakula blew Sughosha, Sahadeva blew Manipushpaka.
श्लोक 17
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥१७॥
श्रेष्ठ धनुर्धर काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट और अपराजित सात्यकि ने शंख बजाए।
The excellent archer king of Kashi, great warrior Shikhandi, Dhrishtadyumna, Virata, and the unconquered Satyaki.
श्लोक 18
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक् पृथक् ॥१८॥
द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र और महाबाहु सुभद्रपुत्र अभिमन्यु ने सभी ने अलग-अलग शंख बजाए।
Drupada, the sons of Draupadi, and Subhadra’s mighty-armed son blew their respective conches.
श्लोक 19
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥१९॥
उस भयंकर ध्वनि ने धार्तराष्ट्रों के हृदय विदीर्ण कर दिए और आकाश-पृथ्वी को प्रतिध्वनित किया।
That roar tore the hearts of Dhritarashtra’s sons; its echo filled the earth and sky.
श्लोक 20
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥२०॥
तब कपिध्वज अर्जुन ने धार्तराष्ट्रों को देखकर धनुष उठाकर शस्त्र चलाने को उद्यत हुआ।
Seeing Dhritarashtra’s sons arrayed, Arjuna whose banner bore the monkey-mark took up his bow.
श्लोक 21
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥२१॥
हे राजन्! तब अर्जुन ने हृषीकेश से कहा— हे अच्युत! मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच खड़ा करो।
O Lord! Arjuna said to Hrishikesh: O Achyuta! Place my chariot between the two armies.
श्लोक 22
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥२२॥
जिससे मैं युद्ध करने की इच्छा से खड़े इन योद्धाओं को देख सकूँ कि इस युद्ध में मुझे किन-किन से युद्ध करना है।
That I may observe those here assembled desirous to fight and know with whom I have to contend in this great trial of arms.
श्लोक 23
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥२३॥
जो धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि पुत्र के हित में युद्ध करने के लिए यहाँ आए हैं, उनको भी मैं देखना चाहता हूँ।
Those who have assembled here to fight, desiring to please in battle the evil-minded son of Dhritarashtra.
श्लोक 24
सञ्जय उवाच | एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥२४॥
संजय बोले— हे भारत! गुडाकेश अर्जुन के ऐसा कहने पर हृषीकेश ने उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कर दिया।
Sanjaya said: O Bharat! Thus addressed by Gudakesha (Arjuna), Hrishikesh stationed the best of chariots between the two armies.
श्लोक 25
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥२५॥
भीष्म, द्रोण आदि सभी राजाओं के सामने कहा— हे पार्थ! इन एकत्रित कुरु वंशियों को देख।
In the presence of Bhishma, Drona and all the kings, said Partha, “Behold these Kurus assembled here!”
श्लोक 26
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातॄन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ॥२६॥
वहाँ पार्थ ने पिताओं, पितामहों, आचार्यों, मातुलों, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों और मित्रों को देखा।
There Partha saw arrayed fathers, grandfathers, teachers, maternal uncles, brothers, sons, grandsons, and friends.
श्लोक 27
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥२७॥
श्वशुरों और सखाओं सहित दोनों सेनाओं में खड़े सभी बंधुओं को कौन्तेय ने देखा।
Fathers-in-law and friends in both armies. Seeing all kinsmen thus standing, Kaunteya was filled with compassion.
श्लोक 28
अर्जुन उवाच |
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
दृष्ट्वैतं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ॥२८॥
अर्जुन बोले— कृपा से व्याप्त होकर विषाद करते हुए बोला— हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा से खड़े इन स्वजनों को देखकर।
Arjuna said: Filled with compassion and grief-stricken, seeing kinsmen desirous of fighting assembled here, O Krishna!
श्लोक 29
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥२९॥
मेरे अंग ढीले पड़ रहे हैं, मुख सूख रहा है, शरीर काँप रहा है, रोंगटे खड़े हो रहे हैं।
My limbs sink, mouth is parched, body shivers, hairs stand on end.
श्लोक 30
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥३०॥
गाण्डीव हाथ से फिसल रहा है, त्वचा जल रही है, खड़ा न रह पाता हूँ, मन भ्रमित हो रहा है।
Gandiva slips from hand, skin burns, I cannot stand steady, mind is reeling.
श्लोक 31
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥३१॥
हे केशव! विपरीत निमित्त दिख रहे हैं, स्वजनों को युद्ध में मारकर भला क्या श्रेय होगा?
I see contrary omens, O Kesava. What good can I see from killing my own kinsmen in battle?
श्लोक 32
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥३२॥
हे कृष्ण! न विजय चाहता हूँ न राज्य-सुख। हे गोविंद! राज्य, भोग, जीवन से हमें क्या लाभ?
I do not desire victory, O Krishna, nor kingdom nor happiness. What is kingdom to us, O Govinda, or pleasures or even life?
श्लोक 33
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥३३॥
जिनके लिए हम राज्य, भोग, सुख चाहते हैं, वे ही प्राण-धन त्यागकर युद्ध में खड़े हैं।
Those for whose sake we desire kingdom etc., are standing here, ready to sacrifice life and riches in battle.
श्लोक 34
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः स्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥३४॥
आचार्य, पिता, पुत्र, पितामह, मातुल, श्वशुर, पौत्र, साला और अन्य सम्बन्धी।
Teachers, fathers, sons, grandfathers, maternal uncles, fathers-in-law, grandsons, brothers-in-law and other relatives.
श्लोक 35
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥३५॥
हे मधुसूदन! इन्हें मैं मारना नहीं चाहता चाहे वे मुझे ही मार दें। त्रिलोक राज्य के लिए भी नहीं।
O Madhusudana, I do not wish to kill them even if they kill me, even for rulership of three worlds, what then of earth?
श्लोक 36
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ॥३६॥
हे जनार्दन! धार्तराष्ट्रों को मारकर हमें क्या सुख मिलेगा? इन आततायियों को मारने से पाप ही लगेगा।
Killing Dhritarashtra’s sons, what joy can it give, O Janardana? Killing these aggressors we shall incur sin only.
श्लोक 37
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥३७॥
अतः हे माधव! धार्तराष्ट्रों सहित स्वजनों को मारना उचित नहीं। स्वजनों को मारकर सुखी कैसे होंगे?
Therefore we should not kill our kinsmen, Dhritarashtra’s sons. How can we be happy killing our own people, O Madhava?
श्लोक 38
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥३८॥
लोभ से अंधे इन लोगों को कुलनाश का दोष और मित्रद्रोह का पाप नहीं दिखता।
Though these whose minds are overwhelmed by greed do not see the evil arising from destruction of family and sin in treachery to friends.
श्लोक 39
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥
हे जनार्दन! जो कुलनाश के दोष को देखते हैं, हमें इस पाप से क्यों न लौटें?
Why should not we who clearly see the evil, turn away from this sin, O Janardana?
श्लोक 40
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
कुलनाश से सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं। धर्म के नष्ट होने पर सम्पूर्ण कुल अधर्म से भर जाता है।
With destruction of family, eternal family traditions perish. When tradition perishes, righteousness is lost and the entire family is overcome by irreligion.
श्लोक 41
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ॥४१॥
अधर्म के बढ़ने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं। स्त्रियों के दूषित होने से वर्णसंकर हो जाता है।
When irreligion prevails, O Varshneya, the women of the family become corrupt; corruption of women leads to intermixture of castes.
श्लोक 42
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥४२॥
वर्णसंकर से कुलघातियों और कुल के पितरों को नरक मिलता है क्योंकि पिण्डोदक क्रिया लुप्त हो जाती है।
Intermixture of castes leads the destroyers of family and the family to hell since oblations cease for their ancestors.
श्लोक 43
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्सन्नकुलधर्माणां वर्णधर्माश्च शाश्वताः ॥४३॥
इन वर्णसंकरकारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुलधर्म और वर्णधर्म नष्ट हो जाते हैं।
By these evils caused by varna-sankara, eternal duties of family and varna traditions of those destroyers of family perish.
श्लोक 44
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥४४॥
हे जनार्दन! जिनके कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, हमने सुना है वे निश्चय ही नरक में जाते हैं।
We have heard, O Janardana, that those whose family traditions are destroyed are destined to dwell in hell.
श्लोक 45
अहो बत महत्पापं कर्तुमव्यसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥४५॥
हाय! राज्य-सुख के लोभ से स्वजनों को मारने को उद्यत होकर हमने महान पाप करने का निश्चय कर लिया।
Alas! Driven by desire for kingdom and enjoyment we have resolved to commit great sin by killing our own kinsmen.
श्लोक 46
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥४६॥
यदि शस्त्ररहित और अप्रतिरोधी मेरा धार्तराष्ट्र रण में मार डालें तो वह मेरे लिए कल्याणकारी होगा।
If the armed sons of Dhritarashtra should kill me in battle while I offer no resistance, unarmed, it would be better for me.
श्लोक 47
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥४७॥
संजय बोले— इस प्रकार युद्धभूमि में बोलकर शोक से व्याकुल अर्जुन ने बाण सहित धनुष त्यागकर रथ के पृष्ठ भाग में बैठ गया।
Sanjaya said: Having thus spoken on the battlefield, Arjuna overwhelmed with grief cast aside his bow with arrows and sat down on the chariot.
॥ अध्याय 1 समाप्त ॥
अर्जुन विषाद योग
अगला अध्याय: अध्याय 2 – सांख्य योग
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 : अर्जुन विषाद योग
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 अर्जुन विषाद योग मानव जीवन की आंतरिक संघर्ष की स्थिति को दर्शाता है। कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में अर्जुन अपने ही संबंधियों, गुरुओं और मित्रों को सामने देखकर मोह और विषाद में डूब जाते हैं।
यह अध्याय हमें सिखाता है कि जीवन में जब भ्रम, भय और मानसिक द्वंद्व उत्पन्न होता है, तब सही मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। अर्जुन का यह विषाद ही आगे चलकर गीता के दिव्य ज्ञान का कारण बनता है।
महत्वपूर्ण FAQs – अध्याय 1 अर्जुन विषाद योग
1. अर्जुन विषाद योग का मुख्य विषय क्या है?
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 का मुख्य विषय अर्जुन की मानसिक दुविधा और युद्ध के प्रति उत्पन्न मोह का वर्णन है।
2. अर्जुन क्यों विचलित हो गए थे?
अर्जुन अपने ही संबंधियों और गुरुओं को युद्ध में देखकर करुणा और मोह से व्याकुल हो गए थे।
3. क्या अर्जुन युद्ध से पीछे हटना चाहते थे?
हाँ, अर्जुन ने अपने शस्त्र त्याग दिए और युद्ध न करने की इच्छा प्रकट की।
4. अध्याय 1 का आध्यात्मिक महत्व क्या है?
यह अध्याय दर्शाता है कि आध्यात्मिक ज्ञान की शुरुआत अक्सर जीवन के संकट और विषाद से होती है।
5. अर्जुन का विषाद क्यों आवश्यक था?
अर्जुन का विषाद ही भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य उपदेश का कारण बना, जिससे गीता का ज्ञान प्रकट हुआ।
6. अर्जुन विषाद योग आज के जीवन में कैसे प्रासंगिक है?
आज भी मनुष्य कठिन निर्णयों के समय मानसिक संघर्ष से गुजरता है; यह अध्याय हमें सही मार्गदर्शन की प्रेरणा देता है।
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