कार्तिक में दामोदराष्टकम् क्यों गाते हैं? आठ श्लोक और उनका सरल हिंदी अर्थ

प्रकाशित: 24 अक्टूबर 2026

श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रतीकात्मक चित्र
श्रीकृष्ण का प्रतीकात्मक चित्र; यह दामोदर लीला का चित्रण नहीं है।

कभी किसी मंदिर में दीपदान के समय “नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं” सुना है? यही दामोदराष्टकम् की शुरुआत है। इसकी विशेषता केवल मधुर धुन नहीं है। इसमें भक्त प्रभु से बड़ी उपलब्धियों की सूची नहीं माँगता; वह चाहता है कि बालगोपाल का प्रेममय रूप उसके मन में बना रहे।

दामोदराष्टकम् आठ श्लोकों की कृष्ण-स्तुति है। कार्तिक में अनेक वैष्णव मंदिरों और घरों में इसे दीपदान के साथ गाया जाता है। नीचे प्रचलित आठ-श्लोकी पाठ और उसका सरल भावार्थ दिया गया है।

“दामोदर” नाम का भाव क्या है?

“दाम” रस्सी और “उदर” पेट के अर्थ में आता है। बालकृष्ण को यशोदा द्वारा ऊखल से बाँधने की लीला के संदर्भ में यह नाम प्रसिद्ध है। भक्त के लिए इस दृश्य का केंद्र कठोर बंधन नहीं, माँ का वात्सल्य और भगवान का प्रेम से बँध जाना है। स्तुति परंपरा में सत्यव्रत मुनि से संबद्ध मानी जाती है।

दामोदराष्टकम्: पूरा पाठ और सरल भावार्थ

श्लोक 1

नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं
लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम्।
यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं
परामृष्टमत्यन्ततो द्रुत्य गोप्या॥१॥

सरल भावार्थ: गोकुल में शोभित बालकृष्ण को प्रणाम है। यशोदा के डर से भागते उस बालरूप को माँ दौड़कर पकड़ लेती हैं। ईश्वर का विराट परिचय यहाँ घर के स्नेहभरे दृश्य में उतरता है।

श्लोक 2

रुदन्तं मुहुर्नेत्रयुग्मं मृजन्तं
कराम्भोजयुग्मेन सातङ्कनेत्रम्।
मुहुः श्वासकम्पत्रिरेखाङ्ककण्ठ-
स्थितग्रैवं दामोदरं भक्तिबद्धम्॥२॥

सरल भावार्थ: रोते, आँखें मलते बालक के गले का हार सिसकियों से हिल रहा है। भक्त उस दामोदर को प्रणाम करता है जो प्रेमपूर्ण भक्ति से बँधे हैं।

श्लोक 3

इतीदृक्स्वलीलाभिरानन्दकुण्डे
स्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम्।
तदीयेषितज्ञेषु भक्तैर्जितत्वं
पुनः प्रेमतस्तं शतावृत्ति वन्दे॥३॥

सरल भावार्थ: इन बाललीलाओं से गोकुल आनंदमय हो जाता है। प्रभु यह प्रकट करते हैं कि भक्त का प्रेम उन्हें जीत लेता है। कवि प्रेम से बार-बार प्रणाम करता है।

श्लोक 4

वरं देव मोक्षं न मोक्षावधिं वा
न चान्यं वृणेऽहं वरेशादपीह।
इदं ते वपुर्नाथ गोपालबालं
सदा मे मनस्याविरास्तां किमन्यैः॥४॥

सरल भावार्थ: भक्त की इच्छा कोई बड़ा वरदान नहीं है। वह चाहता है कि बालगोपाल का यही रूप सदा उसके मन में बना रहे। प्रभु का स्मरण उसके लिए स्वयं सबसे प्रिय प्राप्ति है।

श्लोक 5

इदं ते मुखाम्भोजमत्यन्तनीलै-
र्वृतं कुन्तलैः स्निग्धरक्तैश्च गोप्या।
मुहुश्चुम्बितं बिम्बरक्ताधरं मे
मनस्याविरास्तामलं लक्षलाभैः॥५॥

सरल भावार्थ: घुँघराले केशों से घिरे, लाल अधरों वाले उस मुख का स्मरण है जिसे माँ बार-बार चूमती हैं। भक्त चाहता है कि यह वात्सल्यभरा रूप उसके भीतर बस जाए।

श्लोक 6

नमो देव दामोदरानन्त विष्णो
प्रसीद प्रभो दुःखजालाब्धिमग्नम्।
कृपादृष्टिवृष्ट्यातिदीनं बतानु-
गृहाणेश मामज्ञमेध्यक्षिदृश्यः॥६॥

सरल भावार्थ: दुख में डूबा भक्त दामोदर, अनन्त और विष्णु को पुकारता है। वह अपनी असमर्थता स्वीकार करके कृपा माँगता है और प्रभु के दर्शन की प्रार्थना करता है।

श्लोक 7

कुवेरात्मजौ बद्धमूर्त्यैव यद्वत्
त्वया मोचितौ भक्तिभाजौ कृतौ च।
तथा प्रेमभक्तिं स्वकां मे प्रयच्छ
न मोक्षे ग्रहो मेऽस्ति दामोदरेह॥७॥

सरल भावार्थ: कुबेर के दोनों पुत्रों के उद्धार को याद करके भक्त प्रेम-भक्ति माँगता है। उसका आग्रह किसी दूसरी उपलब्धि से अधिक प्रभु के प्रति प्रेम पर है।

श्लोक 8

नमस्तेऽस्तु दाम्ने स्फुरद्दीप्तिधाम्ने
त्वदीयोदरायाथ विश्वस्य धाम्ने।
नमो राधिकायै त्वदीयप्रियायै
नमोऽनन्तलीलाय देवाय तुभ्यम्॥८॥

सरल भावार्थ: प्रभु को बाँधने वाली रस्सी, उनके उदर, उनकी प्रिया राधिका और अनन्त लीलामय भगवान को प्रणाम है। स्तुति नमस्कार और प्रेम के भाव में पूर्ण होती है।

इस स्तुति का मुख्य भाव

पहले श्लोकों में बाललीला का दृश्य खुलता है और आगे भक्त की प्रार्थना सामने आती है। विशेष रूप से चौथे और सातवें श्लोक में प्रेम-भक्ति की माँग ध्यान खींचती है। इसे पढ़ते हुए अपने मन से भी पूछ सकते हैं—क्या प्रार्थना में केवल माँग ही है, या स्मरण और कृतज्ञता के लिए भी जगह है?

यह सवाल आत्मचिंतन का निमंत्रण है। इसका अर्थ अपनी कठिनाई छिपाना या दुख में सहायता न माँगना नहीं है। स्तुति का छठा श्लोक स्वयं विनम्र पुकार है। पाठ को अपने और दूसरों के प्रति संवेदनशील होने का अवसर बनाएँ।

पहली बार पढ़ रहे हैं तो कैसे शुरू करें?

  1. पूरे पाठ को तेज गति से समाप्त करने से पहले एक श्लोक सुनें और उसी को धीरे पढ़ें।
  2. संयुक्त अक्षर कठिन लगें तो पंक्ति को शब्दों में बाँटकर अभ्यास करें। किसी परिचित पाठक से उच्चारण समझ सकते हैं।
  3. हर श्लोक का अर्थ पढ़ने के बाद कुछ क्षण उस भाव पर रुकें। धुन याद होना और अर्थ समझना अलग-अलग अभ्यास हैं।
  4. दीपक जलाएँ तो स्थिर आधार पर रखें। बच्चों को साथ लें तो लौ की देखभाल वयस्क करे।
  5. परिवार के साथ पढ़ते समय गलती पर हँसने के बजाय धीरे से मदद करें। सहजता से ही नियमितता बनती है।

क्या इसे केवल कार्तिक में पढ़ सकते हैं?

कार्तिक में इसका विशेष गायन होता है, लेकिन कृष्ण-स्मरण के रूप में दूसरे दिनों में भी पाठ किया जा सकता है। विशेष मंदिर-सेवा या संकल्प के नियम हों तो उस परंपरा के जानकार से समझें। यहाँ किसी निश्चित संख्या या परिणाम की गारंटी वाला नियम नहीं जोड़ा गया है।

किसी पुस्तक में शब्द अलग मिलें तो?

प्रचलित पाठों में शब्द और संधि के छोटे अंतर मिलते हैं। अलग संस्करण की पंक्तियों को अपनी ओर से जोड़कर नया पाठ न बनाएँ। यहाँ मंदिरों में गाए जाने वाले आठ-श्लोकी रूप को आधार बनाया गया है। भावार्थ शब्दशः अनुवाद के बजाय सरल स्वतंत्र प्रस्तुति है।

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पाठ-संदर्भ: दामोदराष्टकम् का प्रचलित पाठ · मंदिर का आठ-श्लोकी पाठ। संस्कृत स्तुति परंपरागत है; हिंदी भावार्थ और पाठ-अभ्यास के सुझाव स्वतंत्र हैं।


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