राघव शक्ति मिलन: गोरखपुर के बसंतपुर में राम–लक्ष्मण करते हैं मां दुर्गा का पूजन

गोरखपुर का राघव शक्ति मिलन विजयादशमी की उन परंपराओं में है, जिनमें रामलीला और दुर्गा पूजा एक ही पड़ाव पर साथ दिखाई देती हैं। बसंतपुर के दुर्गा मिलन चौराहे पर माताजी की विसर्जन यात्रा के दौरान रामलीला के राम–लक्ष्मण मां दुर्गा का पूजन करते हैं। राम का शक्ति के सामने नमन करना ही इस मिलन का सबसे सुंदर भाव है।

राघव शक्ति मिलन के भाव में मां दुर्गा की आराधना का प्रतीकात्मक चित्र
मां दुर्गा का प्रतीकात्मक चित्र; आयोजन की वास्तविक तस्वीर नहीं।

राघव शक्ति मिलन कहाँ होता है?

इस लेख का स्थान गोरखपुर का बसंतपुर दुर्गा मिलन चौराहा है। समाचारों में इसी पड़ाव का उल्लेख बसंतपुर तिराहा स्थित दुर्गा मंदिर के रूप में मिलता है। बर्डघाट रामलीला से जुड़ा यह मिलन नगर की विजयादशमी परंपरा का हिस्सा है।

माताजी की प्रतिमा जब विसर्जन के लिए प्रस्थान करती है, तब रास्ते में होने वाला पूजन विदाई को भी आराधना का क्षण बना देता है। राम–लक्ष्मण के स्वरूपों की उपस्थिति में श्रद्धालुओं के लिए रामलीला की कथा और देवी की आराधना एक साथ जुड़ती हैं।

2026 में राघव शक्ति मिलन की तारीख

आयोजक समितियों की प्रेसवार्ता पर आधारित 5 अक्टूबर की सूचना के अनुसार, राघव शक्ति मिलन बुधवार, 21 अक्टूबर 2026 के लिए घोषित है। कार्यक्रम के क्रम में बर्डघाट रामलीला मैदान में रावण वध के बाद श्रीराम के स्वरूप अपनी सेना के साथ श्रीराम चौक होते हुए बसंतपुर के दुर्गा मंदिर पहुँचते हैं, जहाँ मां शक्ति की आरती होती है।

इस वर्ष की उपलब्ध सूचना में मिलन का निश्चित घड़ी-समय नहीं दिया गया है। इसलिए पहुँचने से पहले स्थानीय आयोजन समिति की ताज़ा घोषणा देख लें। पिछले वर्ष का समय इस बार का समय मानकर न चलें।

राम–लक्ष्मण मां दुर्गा की पूजा क्यों करते हैं?

इस परंपरा का केंद्र आराधना है। रामलीला में राम और लक्ष्मण की भूमिका निभाने वाले स्वरूप जब मां के सम्मुख पूजन करते हैं, तो श्रद्धालु इसे मर्यादा और शक्ति के मिलन के रूप में अनुभव करते हैं। विजय के उत्सव में भी नमन और विनम्रता के लिए जगह है—यही इस दृश्य को भावपूर्ण बनाता है।

एक ओर मां की विदाई की भावना है, दूसरी ओर रामलीला की विजयादशमी। दोनों के बीच यह पूजन किसी प्रतियोगिता का दृश्य नहीं, साझा श्रद्धा का पड़ाव है। परिवार के साथ आने वाले बच्चों के लिए भी यह समझने का अवसर है कि उत्सव केवल देखने की चीज नहीं; उसके पीछे लोगों की आस्था और पीढ़ियों की स्मृतियाँ होती हैं।

“विजय का सबसे सुंदर रूप वह है, जो शक्ति के सामने विनम्र होना जानता है।”

लेख का मौलिक भाव-वाक्य; शास्त्रीय उद्धरण नहीं।

बसंतपुर की परंपरा का इतिहास

दैनिक जागरण की 2025 की रिपोर्ट इस परंपरा की शुरुआत 1948 से बताती है। उसमें बसंतपुर में श्रीराम द्वारा दुर्गाबाड़ी की मां दुर्गा की आरती और प्रतिमा की प्रदक्षिणा के क्रम का वर्णन है। वर्ष बदलते हैं, लेकिन राम और शक्ति के इस मिलन की स्थानीय पहचान बनी रहती है।

यही कारण है कि राघव शक्ति मिलन को केवल रामलीला के एक अतिरिक्त कार्यक्रम की तरह देखना अधूरा लगता है। बसंतपुर का यह पड़ाव लोगों के लिए अपने शहर की उत्सव-स्मृति से जुड़ा है। इसमें भाग लेने वाला परिवार अगली पीढ़ी को सिर्फ एक आयोजन नहीं दिखाता, अपने नगर की परंपरा से भी परिचित कराता है।

दर्शन के लिए जाएँ तो ध्यान रखें

  • पूजन, प्रतिमा और शोभायात्रा के लिए रास्ता खुला रखें।
  • बच्चों और बुज़ुर्गों के साथ पहले से मिलने का एक सुरक्षित स्थान तय करें।
  • फोटो या वीडियो लेते समय आरती और दूसरे श्रद्धालुओं के दर्शन में बाधा न डालें।
  • स्थानीय यातायात और आयोजन संबंधी निर्देशों का पालन करें।

राघव शक्ति मिलन से जुड़े छोटे सवाल

क्या यह बसंतपुर वाला आयोजन है?

हाँ। यहाँ गोरखपुर के बसंतपुर दुर्गा मिलन चौराहे की परंपरा का वर्णन है, जिसे रिपोर्टों में बसंतपुर तिराहे के दुर्गा मंदिर से जोड़ा गया है।

माताजी की विदाई से इसका क्या संबंध है?

विसर्जन के लिए निकलने वाली माताजी की यात्रा और रामलीला के स्वरूपों का पूजन इस मिलन के भाव को साथ लाते हैं।

क्या हर वर्ष तारीख और समय एक रहता है?

नहीं। यह विजयादशमी के आयोजन-क्रम से जुड़ा है; अंग्रेज़ी तारीख और स्थानीय कार्यक्रम का समय हर वर्ष की सूचना से देखें।

रामलीला के प्रसंगों में रुचि हो तो रावण–लक्ष्मण के अंतिम उपदेश की लोकप्रचलित कथा भी पढ़ सकते हैं।


संदर्भ: अमर उजाला, 5 अक्टूबर 2026—आयोजक समितियों की सूचना; दैनिक जागरण, 2 अक्टूबर 2025—परंपरा का विवरण।


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