गीता का उपदेश: कर्म की अनिवार्यता
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श्लोक ३.५
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।
हिंदी अनुवाद
कोई भी मनुष्य एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति के गुणों द्वारा सभी प्राणियों से कर्म करवाया जाता है।
श्लोक की व्याख्या
भगवद् गीता के इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को जीवन के एक गहन सत्य से अवगत कराते हैं। वे कहते हैं कि कर्म करना मनुष्य की प्रकृति का अभिन्न अंग है। हमारा मन, शरीर और आत्मा निरंतर गतिशील रहते हैं, और यह गतिशीलता हमें कर्म करने के लिए प्रेरित करती है। प्रकृति के तीन गुण—सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण—हमारे विचारों और कर्मों को प्रभावित करते हैं। चाहे हम सचेत रूप से कर्म करें या न करें, हमारी प्रकृति हमें कर्म करने के लिए बाध्य करती है।
इस श्लोक का संदेश यह है कि कर्म से भागना संभव नहीं है। चाहे हम कार्य करें या न करें, हमारा मन और शरीर किसी न किसी रूप में कर्म में संलग्न रहते हैं। इसलिए, श्री कृष्ण अर्जुन को निष्काम कर्म योग का मार्ग अपनाने की सलाह देते हैं, जिसमें कर्म को बिना स्वार्थ और आसक्ति के किया जाता है।
महत्वपूर्ण बिंदु
- कर्म हमारी प्रकृति है: मनुष्य का शरीर और मन कर्म करने के लिए ही बना है। चाहे वह शारीरिक कार्य हो या मानसिक चिंतन, कर्म हमेशा होता रहता है।
- प्रकृति के गुणों का प्रभाव: सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण हमारे व्यवहार और कर्मों को निर्धारित करते हैं। ये गुण हमारी सोच और कार्यों को दिशा देते हैं।
- कर्म से बचना असंभव: कोई भी व्यक्ति कर्म किए बिना एक पल भी नहीं रह सकता। निष्क्रियता भी एक प्रकार का कर्म है।
- कर्म की महत्ता: कर्म हमारे जीवन का आधार है। यह हमें उद्देश्य देता है और हमारे विकास का मार्ग प्रशस्त करता है।
- निष्काम कर्म का महत्व: श्री कृष्ण हमें सिखाते हैं कि कर्म को फल की इच्छा के बिना करना चाहिए। इससे मन की शांति और आत्मिक उन्नति होती है।
आज के जीवन में प्रासंगिकता
आधुनिक जीवन में, हम अक्सर कर्म के बोझ से थक जाते हैं या परिणामों की चिंता में डूब जाते हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि कर्म करना हमारी प्रकृति का हिस्सा है, और इसे स्वीकार करने से हम अपने जीवन को और अधिक सार्थक बना सकते हैं। हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, लेकिन फल की चिंता छोड़कर। इससे तनाव कम होता है और मन शांत रहता है।
उदाहरण के लिए, एक विद्यार्थी पढ़ाई करता है, कर्मचारी अपने कार्य को पूरा करता है, और माता-पिता अपने बच्चों की देखभाल करते हैं। ये सभी कर्म हैं, जो प्रकृति के गुणों से प्रेरित हैं। इस श्लोक का पालन करते हुए, हमें अपने कार्यों को पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ करना चाहिए, बिना परिणाम की चिंता किए।
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