श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5: कर्म संन्यास योग – सभी श्लोक और हिंदी अर्थ
श्रीमद्भगवद्गीता हिंदू धर्म का एक पवित्र ग्रंथ है, जो जीवन के गहरे दर्शन और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। इसका पांचवां अध्याय – कर्म संन्यास योग कर्म और संन्यास के बीच संतुलन की शिक्षा देता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि कर्मयोग और संन्यासयोग दोनों ही मुक्ति के मार्ग हैं, लेकिन कर्मयोग अधिक व्यावहारिक और श्रेष्ठ है। इस लेख में हम अध्याय 5 के सभी 29 श्लोक, उनके संस्कृत मूल, रोमन लिप्यंतरण, और हिंदी में अर्थ प्रस्तुत कर रहे हैं।
कर्म संन्यास योग का महत्व
कर्म संन्यास योग में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के संदेह को दूर करते हैं कि कर्म और संन्यास में से कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है। यह अध्याय हमें सिखाता है कि सच्चा संन्यास वह नहीं है जो कर्म छोड़ देता है, बल्कि वह है जो कर्म को आसक्ति और फल की इच्छा के बिना करता है। यह अध्याय आत्म-संयम, समता, और भक्ति के महत्व को भी उजागर करता है।
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 के सभी श्लोक और उनके अर्थ
नीचे दिए गए सभी श्लोक संस्कृत में, उनके रोमन लिप्यंतरण और हिंदी में अर्थ के साथ प्रस्तुत किए गए हैं। प्रत्येक श्लोक के बाद इसका भावार्थ भी दिया गया है, ताकि आप इसके गहरे अर्थ को समझ सकें।
श्लोक 1
संस्कृत: संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि। यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्।।
रोमन लिप्यंतरण: Sannyāsam karmaṇām kṛṣṇa punaryōgam ca śaṁsasi, yacchrēya etayōrēkam tanmē brūhi suniścitam.
हिंदी अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास और कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में से जो एक श्रेष्ठ हो, उसे निश्चित रूप से मुझे बताइए।
भावार्थ: अर्जुन कर्म संन्यास और कर्मयोग के बीच भ्रमित हैं और श्रीकृष्ण से स्पष्ट मार्गदर्शन मांगते हैं।
श्लोक 2
संस्कृत: श्री भगवानुवाच संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते।।
रोमन लिप्यंतरण: Śrī bhagavānuvāca sannyāsaḥ karmayōgaśca niḥśrēyasakarāvubhau, tayōstu karmasannyāsātkarmayōgō viśiṣyatē.
हिंदी अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण ने कहा: संन्यास और कर्मयोग दोनों ही कल्याणकारी हैं, किन्तु इन दोनों में कर्म संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है।
भावार्थ: श्रीकृष्ण बताते हैं कि कर्मयोग संन्यास से अधिक व्यावहारिक और श्रेष्ठ है, क्योंकि यह व्यक्ति को सक्रिय रूप से जीवन में संलग्न रखता है।
श्लोक 3
संस्कृत: ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यति।।
रोमन लिप्यंतरण: Jñēyaḥ sa nityasannyāsī yō na dvēṣṭi na kāṅkṣati, nirdvandvō hi mahābāhō sukham bandhātpramucyati.
हिंदी अर्थ: हे महाबाहो! जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी की कामना करता है, उसे सदा संन्यासी जानना चाहिए, क्योंकि वह द्वंद्वों से मुक्त होकर आसानी से बंधनों से मुक्त हो जाता है।
भावार्थ: सच्चा संन्यासी वह है जो नफरत और लालसा से मुक्त हो और समता के साथ जीवन जीता है।
श्लोक 4
संस्कृत: सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दति फलम्।।
रोमन लिप्यंतरण: Sāṅkhyayōgau pṛthagbālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ, ēkamapyāsthitaḥ samyagubhayōrvindati phalam.
हिंदी अर्थ: केवल अज्ञानी लोग ही सांख्य (ज्ञानयोग) और योग (कर्मयोग) को अलग-अलग मानते हैं, विद्वान नहीं। जो एक मार्ग का भी ठीक तरह से पालन करता है, उसे दोनों का फल प्राप्त होता है।
भावार्थ: ज्ञान और कर्मयोग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं; विद्वान इनमें कोई अंतर नहीं देखते।
श्लोक 5
संस्कृत: यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति सः पश्यति।।
रोमन लिप्यंतरण: Yatsāṅkhyaiḥ prāpyatē sthānam tadyōgairapi gamyatē, ēkaṁ sāṅkhyaṁ ca yōgaṁ ca yaḥ paśyati saḥ paśyati.
हिंदी अर्थ: सांख्य (ज्ञानयोग) से जो स्थान प्राप्त होता है, वही कर्मयोग से भी प्राप्त किया जा सकता है। जो सांख्य और योग को एक समान देखता है, वही सही देखता है।
भावार्थ: दोनों मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं, और सच्चा दृष्टिकोण उन्हें एक समान देखता है।
श्लोक 6
संस्कृत: संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति।।
रोमन लिप्यंतरण: Sannyāsastu mahābāhō duḥkhamāptumayōgataḥ, yōgayuktō munirbrahma nacirēṇādhigacchati.
हिंदी अर्थ: हे महाबाहो! बिना योग के संन्यास प्राप्त करना दुखदायी है। किन्तु कर्मयोग में संलग्न मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।
भावार्थ: कर्मयोग के बिना संन्यास कठिन है, लेकिन कर्मयोगी आसानी से परमात्मा तक पहुंचता है।
श्लोक 7
संस्कृत: योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते।।
रोमन लिप्यंतरण: Yōgayuktō viśuddhātmā vijitātmā jitēndriyaḥ, sarvabhūtātmabhūtātmā kurvannapi na lipyatē.
हिंदी अर्थ: जो कर्मयोग में संलग्न है, जिसका मन शुद्ध है, जिसने आत्मा और इंद्रियों पर विजय प्राप्त की है, और जो सभी प्राणियों के आत्मा को अपने आत्मा के समान देखता है, वह कर्म करते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता।
भावार्थ: कर्मयोगी, जो सभी में एक ही आत्मा देखता है, कर्मों के बंधन से मुक्त रहता है।
श्लोक 8-9
संस्कृत: नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्। पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्। प्रलपन्विसृजन्गृह्ण्न्नुन्मिषन्निमिषन्नपि।।
रोमन लिप्यंतरण: Naiva kiñcitkarōmīti yuktō manyēta tattvavit, paśyañśṛṇvanspṛśañjighrannaśnan gacchansvapañśvasan, pralapanvisṛjangṛhṇnunamiṣannimiṣannapi.
हिंदी अर्थ: तत्त्व को जानने वाला योगी यह सोचता है कि मैं कुछ भी नहीं करता, यद्यपि वह देखता, सुनता, स्पर्श करता, सूंघता, खाता, चलता, सोता, श्वास लेता, बोलता, त्यागता, ग्रहण करता, और आंखें खोलता-बंद करता है।
भावार्थ: सच्चा योगी अपने कर्मों को आत्मा से अलग देखता है और कर्मों से लिप्त नहीं होता।
श्लोक 10
संस्कृत: ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा।।
रोमन लिप्यंतरण: Brahmaṇyādhāya karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā karōti yaḥ, lipyatē na sa pāpēna padmapatramivāmbhasā.
हिंदी अर्थ: जो कर्मों को परमात्मा को समर्पित करके और आसक्ति छोड़कर करता है, वह पाप से उसी तरह लिप्त नहीं होता जैसे कमल का पत्ता जल से नहीं भीगता।
भावार्थ: निष्काम कर्म करने वाला पाप और बंधनों से मुक्त रहता है।
श्लोक 11
संस्कृत: कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये।।
रोमन लिप्यंतरण: Kāyēna manasā buddhyā kēvalairindriyairapi, yōginaḥ karma kurvanti saṅgaṁ tyaktvātmaśuddhayē.
हिंदी अर्थ: योगीजन अपने शरीर, मन, बुद्धि और इंद्रियों के द्वारा आसक्ति छोड़कर केवल आत्मा की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।
भावार्थ: कर्मयोगी कर्मों को आत्म-शुद्धि के लिए करते हैं, न कि सांसारिक लाभ के लिए।
श्लोक 12
संस्कृत: युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्। अयुक्तः कामकारेन फले सक्तो निबध्यते।।
रोमन लिप्यंतरण: Yuktaḥ karmaphalaṁ tyaktvā śāntimāpnōti naiṣṭhikīm, ayuktaḥ kāmakārēna phalē saktō nibadhyatē.
हिंदी अर्थ: कर्मयोगी कर्मों के फल को त्यागकर परम शांति प्राप्त करता है, जबकि अयुक्त व्यक्ति फल की कामना से बंधन में पड़ता है।
भावार्थ: कर्मफल की आसक्ति बंधन का कारण है, जबकि निष्काम कर्म शांति देता है।
श्लोक 13
संस्कृत: सर्वकर्माणि मनसा संन्यास्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्।।
रोमन लिप्यंतरण: Sarvakarmāṇi manasā sannyāsyāstē sukhaṁ vaśī, navadvārē purē dēhī naiva kurvanna kārayan.
हिंदी अर्थ: आत्मसंयमी व्यक्ति मन से सभी कर्मों का संन्यास करके, नौ द्वारों वाले शरीर में रहते हुए भी न कुछ करता है और न करवाता है।
भावार्थ: आत्मसंयम के साथ कर्मों का त्याग करने वाला व्यक्ति कर्मों से मुक्त रहता है।
श्लोक 14
संस्कृत: न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।
रोमन लिप्यंतरण: Na kartṛtvaṁ na karmāṇi lōkasya sṛjati prabhuḥ, na karmaphalasaṁyōgaṁ svabhāvastu pravartatē.
हिंदी अर्थ: परमेश्वर न तो कर्तापन, न कर्म और न कर्मफल के संयोग को उत्पन्न करता है। यह सब प्रकृति के स्वभाव से होता है।
भावार्थ: कर्म और उनके फल प्रकृति के स्वभाव से उत्पन्न होते हैं, न कि परमेश्वर से।
श्लोक 15
संस्कृत: नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।
रोमन लिप्यंतरण: Nādattē kasyacitpāpaṁ na caiva sukṛtaṁ vibhuḥ, ajñānēnāvṛtaṁ jñānaṁ tēna muhyanti jantavaḥ.
हिंदी अर्थ: परमेश्वर न किसी का पाप और न पुण्य ग्रहण करता है। प्राणियों का ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है, जिसके कारण वे मोह में पड़ते हैं।
भावार्थ: अज्ञान के कारण प्राणी भ्रम में पड़ते हैं, परमेश्वर तटस्थ रहता है।
श्लोक 16
संस्कृत: ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशति तत्परम्।।
रोमन लिप्यंतरण: Jñānēna tu tadajñānaṁ yēṣāṁ nāśitamātmanaḥ, tēṣāmādityavajjñānaṁ prakāśati tatparam.
हिंदी अर्थ: जिनका अज्ञान आत्मज्ञान से नष्ट हो गया है, उनके लिए वह ज्ञान सूर्य के समान परम तत्त्व को प्रकाशित करता है।
भावार्थ: आत्मज्ञान अज्ञान के अंधकार को दूर कर परम सत्य को उजागर करता है।
श्लोक 17
संस्कृत: तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः। गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः।।
रोमन लिप्यंतरण: Tadbuddhayastadātmānastanniṣṭhāstatparāyaṇāḥ, gacchantyapunarāvṛttiṁ jñānanirdhūtakalmaṣāḥ.
हिंदी अर्थ: जिनकी बुद्धि, आत्मा, और निष्ठा परमात्मा में लीन है, और जो ज्ञान से अपने पापों को धो चुके हैं, वे पुनर्जन्म से मुक्त हो जाते हैं।
भावार्थ: परमात्मा में लीन व्यक्ति मुक्ति प्राप्त करता है।
श्लोक 18
संस्कृत: विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।
रोमन लिप्यंतरण: Vidyāvinayasampannē brāhmaṇē gavi hastini, śuni caiał śvapākē ca paṇḍitāḥ samadarśinaḥ.
हिंदी अर्थ: विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और चांडाल में विद्वान समान दृष्टि रखते हैं।
भावार्थ: सच्चा ज्ञानी सभी प्राणियों में एक ही आत्मा देखता है।
श्लोक 19
संस्कृत: इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः।।
रोमन लिप्यंतरण: Ihaiva tairjitaḥ sargō yēṣāṁ sāmyē sthitaṁ manaḥ, nirdōṣaṁ hi samaṁ brahma tasmādbrahmaṇi tē sthitāḥ.
हिंदी अर्थ: जिनका मन समता में स्थिर है, उन्होंने इस जीवन में ही सृष्टि पर विजय प्राप्त कर ली है। ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में स्थित हैं।
भावार्थ: समता के साथ जीने वाला व्यक्ति ब्रह्म में लीन हो जाता है।
श्लोक 20
संस्कृत: न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्। स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः।।
रोमन लिप्यंतरण: Na prahṛṣyētpriyaṁ prāpya nōdvijētprāpya cāpriyam, sthirabuddhirasammūḍhō brahmavidbrahmaṇi sthitaḥ.
हिंदी अर्थ: जो प्रिय प्राप्त होने पर हर्षित नहीं होता और अप्रिय प्राप्त होने पर उद्विग्न नहीं होता, वह स्थिरबुद्धि, असम्मूढ़ और ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म में स्थित है।
भावार्थ: सच्चा ज्ञानी सुख-दुख में समान रहता है।
श्लोक 21
संस्कृत: बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्। स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते।।
रोमन लिप्यंतरण: Bāhyasparśēṣvasaktātmā vindatyātmani yatsukham, sa brahmayōgayuktātmā sukhamakṣayamaśnutē.
हिंदी अर्थ: जो बाहरी विषयों में आसक्त नहीं है, वह आत्मा में सुख प्राप्त करता है। वह ब्रह्मयोग में संलग्न होकर अक्षय सुख प्राप्त करता है।
भावार्थ: आत्मिक सुख ही सच्चा और शाश्वत सुख है।
श्लोक 22
संस्कृत: ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते। आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमति बुधः।।
रोमन लिप्यंतरण: Yē hi saṁsparśajā bhōgā duḥkhayōnaya ēva tē, ādyantavantaḥ kauntēya na tēṣu ramati budhaḥ.
हिंदी अर्थ: हे कुन्तीपुत्र! जो सुख इंद्रियों के संपर्क से उत्पन्न होते हैं, वे दुख के कारण हैं और आदि-अंत वाले हैं। बुद्धिमान उनमें रमण नहीं करता।
भावार्थ: सांसारिक सुख क्षणिक और दुख का कारण हैं।
श्लोक 23
संस्कृत: शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्। कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः।।
रोमन लिप्यंतरण: Śaknōtīhaiva yaḥ sōḍhuṁ prākśarīravimōkṣanāt, kāmakrōdhōdbhavaṁ vēgaṁ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ.
हिंदी अर्थ: जो इस जीवन में ही देह त्यागने से पहले काम और क्रोध के वेग को सहन कर लेता है, वही योगी और सुखी है।
भावार्थ: काम और क्रोध पर नियंत्रण सच्चा सुख देता है।
श्लोक 24
संस्कृत: योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति।।
रोमन लिप्यंतरण: Yō’ntaḥsukhō’ntarārāmastathāntarjyōtirēva yaḥ, sa yōgī brahmanirvāṇaṁ brahmabhūtō’dhigacchati.
हिंदी अर्थ: जो अंतःसुख में रमता है, अंतर्मन में आनंदित रहता है और अंतर्ज्योति से प्रकाशित है, वह योगी ब्रह्म में लीन होकर ब्रह्मनिर्
भावार्थ: आंतरिक सुख और ज्ञान से युक्त योगी परम शांति प्राप्त करता है।
श्लोक 25
संस्कृत: लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।
रोमन लिप्यंतरण: Labhantē brahmanirvāṇamṛṣayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥ, chinnadvaidhā yatātmānaḥ sarvabhūtahitē ratāḥ.
हिंदी अर्थ: जिनके पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके द्वंद्व नष्ट हो गए हैं और जो सभी प्राणियों के हित में रत हैं, वे ऋषि ब्रह्मनिर्
भावार्थ: निःस्वार्थ भाव से सभी के कल्याण में लगे हुए ऋषि मुक्ति प्राप्त करते हैं।
श्लोक 26
संस्कृत: कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्। अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्।।
रोमन लिप्यंतरण: Kāmakrōdhaviyuktānāṁ yatīnāṁ yatacētasām, abhito brahmanirvāṇaṁ vartatē viditātmanām.
हिंदी अर्थ: जो काम और क्रोध से मुक्त हैं, जिनका मन संयमित है और जो आत्मा को जान चुके हैं, उनके लिए ब्रह्मनिर्
भावार्थ: आत्मज्ञान और संयम से युक्त व्यक्ति हर समय मुक्ति के करीब रहता है।
श्लोक 27-28
संस्कृत: स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः। प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ।। यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः। विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः।।
रोमन लिप्यंतरण: Sparśānkṛtvā bahirbāhyāṁścakṣuścaivāntarē bhruvōḥ, prāṇāpānau samau kṛtvā nāsābhyantaracāriṇau. Yatēndriyamanōbuddhirmunirmōkṣaparāyaṇaḥ, vigatēcchābhayakrōdhō yaḥ sadā mukta ēva saḥ.
हिंदी अर्थ: जो बाहरी विषयों को त्याग देता है, नेत्रों को भ्रू के बीच में स्थिर करता है, नासिका में चलने वाले प्राण और अपान को समान करता है, जिसने इंद्रिय, मन और बुद्धि को वश में किया है, जो मोक्ष में रत है, और जो इच्छा, भय और क्रोध से मुक्त है, वह सदा मुक्त है।
भावार्थ: ध्यान और संयम के माध्यम से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है।
श्लोक 29
संस्कृत: भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति।।
रोमन लिप्यंतरण: Bhōktāraṁ yajñatapasāṁ sarvalōkamaheśvaram, suhṛdaṁ sarvabhūtānāṁ jñātvā māṁ śāntimṛcchati.
हिंदी अर्थ: जो मुझे यज्ञ और तप का भोक्ता, सभी लोकों का महान ईश्वर और सभी प्राणियों का सुहृद (मित्र) जानता है, वह शांति प्राप्त करता है।
भावार्थ: परमेश्वर को सभी का मित्र और भोक्ता जानकर मनुष्य परम शांति प्राप्त करता है।
कर्म संन्यास योग का जीवन में महत्व
यह अध्याय हमें सिखाता है कि कर्म और संन्यास दोनों ही मुक्ति के मार्ग हैं, लेकिन कर्मयोग अधिक व्यावहारिक है। निष्काम कर्म, आत्मसंयम, और समदृष्टि के माध्यम से हम जीवन में शांति और सुख प्राप्त कर सकते हैं। गीता का यह अध्याय हमें यह भी बताता है कि सच्चा योगी वह है जो सभी प्राणियों में एक ही आत्मा देखता है और कर्मों को परमात्मा को समर्पित करता है।
निष्कर्ष
श्रीमद्भगवद्गीता का पांचवां अध्याय हमें कर्म और संन्यास के बीच संतुलन की गहरी शिक्षा देता है। यह अध्याय हमें प्रेरित करता है कि हम अपने कर्मों को निष्काम भाव से करें और आत्मज्ञान के माध्यम से जीवन के उच्च लक्ष्यों को प्राप्त करें। Geeta Niti पर इस लेख को पढ़कर आप गीता के इस अध्याय की शिक्षाओं को अपने जीवन में लागू कर सकते हैं।
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