निष्काम कर्म का सिद्धांत – भगवद गीता और अन्य ग्रंथों की दृष्टि से

भगवद गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म करने की प्रेरणा दी, परंतु फल की इच्छा के बिना। इसे ही निष्काम कर्म कहा गया है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

– भगवद गीता 2.47

अन्य ग्रंथों में निष्काम कर्म की व्याख्या

1. उपनिषद

ईशावास्य उपनिषद में कहा गया है:

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
– ईशावास्य उपनिषद, मंत्र 2

इसका अर्थ है कि मनुष्य को सौ वर्षों तक कर्म करते हुए जीने की इच्छा करनी चाहिए, परंतु वह कर्म आत्मा के कल्याण के लिए हो, न कि केवल भौतिक लाभ के लिए।

2. श्रीमद्भागवत पुराण

यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम्।
यदन्यत्रापि दृश्येत तत् तेनैव विनिर्दिशेत॥

– भागवत पुराण 7.11.35

यहाँ कर्म को व्यक्ति के गुणों और स्वभाव से जोड़कर देखा गया है, न कि केवल जाति या पद से। निष्काम कर्म का भाव यहाँ भी स्पष्ट है।

3. योग वशिष्ठ

योग वशिष्ठ में कहा गया है कि:

कर्म करो परंतु मन को उसमें लिप्त मत करो।
– योग वशिष्ठ सार

यह विचार गीता के निष्काम कर्म के सिद्धांत से मेल खाता है।

निष्कर्ष

निष्काम कर्म केवल भगवद गीता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय दर्शन की एक मूल भावना है। यह हमें सिखाता है कि कर्म करते रहो, परंतु फल की चिंता किए बिना। यही जीवन को शांत, स्थिर और आत्मिक रूप से समृद्ध बनाता है।



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