भगवद्गीता पर 10 महान व्यक्तियों की व्याख्या

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भगवद्गीता सनातन धर्म का सार है जिसे विभिन्न संतों, चिंतकों और योगियों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से समझाया है। प्रस्तुत है 10 प्रमुख व्याख्याएं:

1. आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya)

अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक शंकराचार्य ने गीता को आत्मा और ब्रह्म के एकत्व का दर्शन बताया। उनके अनुसार आत्मा अजर, अमर और शुद्ध चेतना है। उन्होंने ‘निष्काम कर्म’ और ‘ज्ञान योग’ को गीता का सार माना।

2. स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda)

विवेकानंद ने गीता को युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत माना। उनके अनुसार, गीता निष्क्रियता नहीं बल्कि कर्म में पूर्ण जागरूकता की बात करती है। उन्होंने आत्मबल, कर्तव्य और राष्ट्रसेवा को गीता का प्रमुख संदेश बताया।

3. महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi)

गांधीजी के लिए गीता जीवन का मार्गदर्शन करने वाली “मां” थी। उन्होंने गीता में अहिंसा, आत्मसंयम, और निष्काम कर्म को पाया। कठिन समय में वे गीता से शक्ति और समाधान प्राप्त करते थे।

4. लोकमान्य तिलक (Bal Gangadhar Tilak)

लोकमान्य तिलक ने अपनी पुस्तक ‘गीता रहस्य’ में कहा कि गीता कर्मयोग का ग्रंथ है। उन्होंने निष्क्रिय सन्यास की आलोचना की और कर्तव्य के प्रति सजग रहने का संदेश दिया।

5. स्वामी रामकृष्ण परमहंस (Swami Ramakrishna Paramhansa)

रामकृष्ण परमहंस के अनुसार, गीता भक्ति और समर्पण की गहराई को दर्शाती है। उन्होंने ईश्वर में पूर्ण विश्वास और प्रेम को गीता का सार माना।

6. श्री अरविंद घोष (Sri Aurobindo)

अरविंद घोष ने गीता की व्याख्या “Integral Yoga” के रूप में की। उनके अनुसार गीता केवल मुक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक विकास का भी मार्गदर्शन करती है।

7. स्वामी चिन्मयानंद (Swami Chinmayananda)

उन्होंने गीता को आधुनिक जीवन के लिए प्रासंगिक बताया। उनके अनुसार, गीता जीवन जीने की कला सिखाती है और मानसिक शांति तथा संतुलन प्रदान करती है।

8. स्वामी रामतीर्थ (Swami Ramtirtha)

स्वामी रामतीर्थ ने आत्मा को ब्रह्म का प्रतिबिंब माना और ‘सोऽहम’ को गीता का सूत्र बताया। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति आत्मा को पहचान लेता है, तब वह सच्ची मुक्ति प्राप्त करता है।

9. स्वामी प्रभुपाद (Swami Prabhupada)

ISKCON के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद ने गीता को भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य संवाद बताया। उनकी रचना “Bhagavad-gītā As It Is” विश्वभर में प्रसिद्ध है। उन्होंने शुद्ध भक्ति पर बल दिया।

10. ओशो रजनीश (Osho Rajneesh)

ओशो ने गीता को अंतरात्मा की क्रांति कहा। उन्होंने युद्ध को प्रतीकात्मक रूप से आत्मिक द्वंद्व बताया और ध्यान को इसका समाधान।

निष्कर्ष

भगवद्गीता हर व्यक्ति के लिए प्रेरणास्त्रोत है – चाहे वह कर्मयोगी हो, ज्ञानयोगी या भक्त। इन दसों व्यक्तित्वों की व्याख्याएं हमें गीता के विविध आयामों को समझने का अवसर देती हैं।

 







 

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