जीवन में भ्रम का समाधान: भगवद्गीता की प्रेरणा

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥

अर्थ:

कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषय में विद्वान भी भ्रमित हो जाते हैं। मैं तुम्हें कर्म का स्वरूप समझाऊंगा, जिसे जानकर तुम अशुभ (भ्रम और बंधन) से मुक्त हो जाओगे।

जीवन का महत्वपूर्ण प्रश्न: भ्रम क्या है, और हम इससे कैसे मुक्त हो सकते हैं?

जीवन में हम अक्सर सही और गलत, कर्म और अकर्म, या अपने उद्देश्य को लेकर भ्रम में पड़ जाते हैं। यह भ्रम तनाव, अनिश्चितता और गलत निर्णयों का कारण बनता है। हम सोचते हैं कि क्या करना उचित है, क्या छोड़ना चाहिए, और जीवन का सही मार्ग कौन सा है। यह भ्रम हमें अपने लक्ष्यों से भटका देता है और मन को अशांत करता है।

गीता का समाधान:

श्रीकृष्ण इस श्लोक में अर्जुन को समझाते हैं कि कर्म और अकर्म का सही ज्ञान भ्रम को दूर करता है। कर्म का अर्थ है अपने कर्तव्यों को निष्काम भाव से करना, बिना फल की इच्छा के। भ्रम तब उत्पन्न होता है, जब हम परिणामों की चिंता करते हैं या अपने कर्तव्यों को समझे बिना कार्य करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि सही ज्ञान और आत्म-जागरूकता से कर्म का स्वरूप समझा जा सकता है, जो हमें भ्रम और अशुभता से मुक्त करता है। अपने कार्यों को ईश्वर को समर्पित कर, बिना स्वार्थ के कर्म करने से मन शांत और स्पष्ट होता है।

व्यावहारिक सुझाव:

  • आत्म-चिंतन करें: रोज़ कुछ समय निकालकर अपने कर्तव्यों और लक्ष्यों पर विचार करें। यह समझें कि आपका कार्य समाज और स्वयं के लिए कैसे महत्वपूर्ण है।
  • ज्ञान अर्जित करें: गीता जैसे आध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ें या गुरुओं से मार्गदर्शन लें, ताकि सही और गलत का भेद स्पष्ट हो।
  • निष्काम कर्म अपनाएं: अपने कार्यों को पूरी निष्ठा से करें, लेकिन उनके परिणामों की चिंता छोड़ दें। यह भ्रम को कम करता है और मन को स्थिर रखता है।

स्रोत: भगवद्गीता, अध्याय 4, श्लोक 16

 

"गीता से नीति, नीति से जीवन"


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