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जीवन का उद्देश्य: भगवद्गीता की शिक्षाओं से प्रेरणा

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

अर्थ:

तुम्हें केवल अपने कर्म करने का अधिकार है, उनके फलों पर नहीं। न तो तुम कर्म के फल के कारण बनो, और न ही अकर्मण्यता में आसक्ति रखो।

जीवन का महत्वपूर्ण प्रश्न: मेरे कर्मों का उद्देश्य क्या है, और मैं जीवन में अर्थ कैसे पाऊं?

हम में से कई लोग इस सवाल से जूझते हैं कि हम जो करते हैं, वह क्यों करते हैं। हम अक्सर अपनी खुशी को परिणामों—सफलता, मान्यता, या भौतिक लाभ—से जोड़ देते हैं, और जब अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं, तो हमें निराशा होती है। यह तनाव, चिंता और जीवन के उद्देश्य को लेकर भ्रम पैदा करता है।

गीता का समाधान:

श्रीकृष्ण इस श्लोक में गहरा समाधान देते हैं: अपने कर्मों पर ध्यान दो, उनके फलों पर नहीं। निष्काम कर्म (बिना फल की इच्छा के कर्म) के माध्यम से, आप अपने जीवन के सच्चे उद्देश्य से जुड़ते हैं। यह दृष्टिकोण आपको अपेक्षाओं और असफलता के डर से मुक्त करता है, जिससे आप कर्म के प्रति समर्पित होकर आनंद पा सकते हैं। श्रीकृष्ण यह भी कहते हैं कि न तो फल की इच्छा में डूबो और न ही डर या शंका के कारण कर्म से विमुख हो। अपने कर्तव्यों को अनुशासन और भक्ति के साथ निभाएं, यह विश्वास रखते हुए कि सही मार्ग स्वयं प्रकट होगा।

व्यावहारिक सुझाव:

  • अपने कर्तव्यों पर चिंतन करें: अपने व्यक्तिगत, व्यावसायिक और सामाजिक कर्तव्यों को पहचानें। उन्हें पूरी निष्ठा से निभाएं, बिना यह सोचे कि बदले में क्या मिलेगा।
  • अपेक्षाओं को छोड़ें: परिणाम आपके पूर्ण नियंत्रण में नहीं हैं, इसे स्वीकार करें। इससे तनाव कम होगा और मन में शांति आएगी।
  • निरंतर कर्म करें: आलस्य या अकर्मण्यता से बचें। अपने कार्यों को सजगता और अर्थपूर्ण ढंग से करें, जो आपके विकास और समाज के लिए योगदान दे।

स्रोत: भगवद्गीता, अध्याय 2, श्लोक 47

 


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