श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय २: सांख्य योग
यहाँ भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के सभी ७२ श्लोक संस्कृत में और उनके अर्थ हिंदी में प्रस्तुत किए गए हैं।
श्लोक १
संजय उवाच:
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्॥
संजय ने कहा: उस समय पाण्डवों की सेना को व्यूहरचित देखकर राजा दुर्योधन अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास गया और यह वचन बोला।
श्लोक २
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥
हे आचार्य! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र (धृष्टद्युम्न) द्वारा व्यूह रचित पाण्डवों की इस विशाल सेना को देखिए।
श्लोक ३
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥
यहाँ इस सेना में भीम और अर्जुन के समान युद्ध में शूरवीर, महान धनुर्धर युयुधान, विराट और महारथी द्रुपद हैं।
श्लोक ४
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः॥
धृष्टकेतु, चेकितान, वीर्यवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और नरश्रेष्ठ शैब्य भी यहाँ हैं।
श्लोक ५
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥
विक्रान्त युधामन्यु, वीर्यवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र (अभिमन्यु) और द्रौपदी के पुत्र—all ये सभी महारथी हैं।
श्लोक ६
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥
हे द्विजोत्तम! अब मेरी सेना के उन प्रमुख नायकों को जान लीजिए, जिन्हें मैं आपके सामने उनके नामों के लिए बता रहा हूँ।
श्लोक ७
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिंजयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥
आप (द्रोणाचार्य), भीष्म, कर्ण, युद्ध में विजयी कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और सौमदत्ति (भूरिश्रवा) भी हैं।
श्लोक ८
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥
और भी बहुत से शूरवीर हैं जो मेरे लिए अपने प्राणों का त्याग करने को तैयार हैं, जो विभिन्न शस्त्रों से सुसज्जित और युद्ध में निपुण हैं।
श्लोक ९
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥
हमारी सेना, जो भीष्म द्वारा सुरक्षित है, अपर्याप्त है, जबकि उनकी सेना, जो भीम द्वारा सुरक्षित है, पर्याप्त है।
श्लोक १०
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥
सभी मोर्चों पर अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार रहते हुए, आप सभी निश्चित रूप से भीष्म की रक्षा करें।
श्लोक ११
श्री भगवानुवाच:
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥
श्री भगवान ने कहा: तुम उन लोगों के लिए शोक करते हो जो शोक करने योग्य नहीं हैं, और फिर भी ज्ञान की बातें करते हो। पण्डित लोग न तो जीवित के लिए और न ही मृतकों के लिए शोक करते हैं।
श्लोक १२
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सर्वं वयमतः परम्॥
न तो मैं कभी नहीं था, न तुम, न ये राजा लोग; और न ही हम में से कोई भविष्य में नहीं रहेगा। हम सभी अनादि काल से हैं।
श्लोक १३
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥
जैसे देहधारी आत्मा इस देह में बाल्यावस्था, यौवन और वृद्धावस्था को प्राप्त करता है, वैसे ही वह दूसरा शरीर प्राप्त करता है। धीर पुरुष इस बात से मोहित नहीं होता।
श्लोक १४
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥
हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों के विषय सुख-दुःख देने वाले, शीत-उष्ण आदि हैं। ये आते-जाते और अनित्य हैं, हे भारत! इन्हें तुम सहन करो।
श्लोक १५
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥
हे पुरुषश्रेष्ठ! जो पुरुष इन सुख-दुःखों से विचलित नहीं होता और समदृष्टि वाला धीर है, वह अमरत्व के योग्य होता है।
श्लोक १६
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥
असत् का भाव नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। तत्त्वदर्शी ऋषियों ने इन दोनों का अन्त (निष्कर्ष) देख लिया है।
श्लोक १७
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥
उस अविनाशी को जानो, जिससे यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त है। इस अव्यय (नाशरहित) का विनाश कोई नहीं कर सकता।
श्लोक १८
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥
इन देहों का अन्त होता है, परन्तु यह नित्य, अनाशी और अप्रमेय आत्मा का शरीर कहा गया है। इसलिए, हे भारत! युद्ध करो।
श्लोक १९
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥
जो इस आत्मा को मारने वाला और जो इसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते। यह न तो मारता है और न ही मारा जाता है।
श्लोक २०
न जायते म्रियते वा कदाचिन्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
यह आत्मा न कभी जन्म लेता है, न मरता है, न यह हुआ है और न यह फिर होगा। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
श्लोक २१
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्॥
हे पार्थ! जो पुरुष इस आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह कैसे किसी को मारता है या मरवाता है?
श्लोक २२
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्य्
अन्यानि संयाति नवानि देही॥
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीरों को त्यागकर नए शरीरों को प्राप्त करता है।
श्लोक २३
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, अग्नि नहीं जला सकती, जल नहीं गीला कर सकता और वायु नहीं सुखा सकती।
श्लोक २४
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥
यह आत्मा अछेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य और अशोष्य है। यह नित्य, सर्वगत, स्थिर, अचल और सनातन है।
श्लोक २५
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥
यह आत्मा अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकारी कहा जाता है। इसलिए इसे इस प्रकार जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक २६
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥
और यदि तुम इस आत्मा को नित्य जन्म लेने वाला और नित्य मरने वाला मानते हो, तब भी, हे महाबाहो! तुम्हें इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक २७
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥
जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मृत्यु को प्राप्त होने वाले का जन्म निश्चित है। इसलिए अपरिहार्य विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक २८
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥
हे भारत! सभी प्राणी जन्म से पहले अव्यक्त हैं, मध्य में व्यक्त हैं और मृत्यु के बाद फिर अव्यक्त हो जाते हैं। इसमें शोक करने की क्या बात है?
श्लोक २९
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्
आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्॥
कोई इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है, कोई आश्चर्य की तरह इसका वर्णन करता है, कोई आश्चर्य की तरह सुनता है, और सुनने के बाद भी कोई इसे नहीं जानता।
श्लोक ३०
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वं न त्वं शोचितुमर्हसि॥
हे भारत! सभी प्राणियों के शरीर में यह आत्मा नित्य और अवध्य है। इसलिए तुम्हें किसी के लिए शोक नहीं करना चाहिए।
श्लोक ३१
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥
अपने स्वधर्म को देखकर भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर और कोई श्रेयस्कर कर्म नहीं है।
श्लोक ३२
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥
हे पार्थ! स्वर्ग का द्वार खोलने वाला यह युद्ध स्वयं प्राप्त हुआ है। सुखी क्षत्रिय ही ऐसे युद्ध को प्राप्त करते हैं।
श्लोक ३३
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥
यदि तुम इस धर्मयुद्ध को नहीं करोगे, तो अपने स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप प्राप्त करोगे।
श्लोक ३४
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥
लोग तुम्हारी अकीर्ति की बात करेंगे, जो कभी नष्ट नहीं होगी। सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश मृत्यु से भी अधिक बुरा है।
श्लोक ३५
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥
महारथी लोग समझेंगे कि तुम भय के कारण युद्ध से हट गए। जिनके लिए तुम बहुत सम्मानित थे, उनके सामने तुम तुच्छ हो जाओगे।
श्लोक ३६
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥
तुम्हारे शत्रु तुम्हारी निन्दा करते हुए बहुत से अवाच्य वचन कहेंगे। इससे बढ़कर दुःख क्या हो सकता है?
श्लोक ३७
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥
हे कुन्तीपुत्र! यदि तुम मारे गए तो स्वर्ग प्राप्त करोगे और यदि जीते तो पृथ्वी का सुख भोगोगे। इसलिए निश्चय करके युद्ध के लिए उठो।
श्लोक ३८
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥
सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान समझकर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ। ऐसा करने से तुम्हें पाप नहीं लगेगा।
श्लोक ३९
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥
हे पार्थ! यह सांख्य योग की बुद्धि तुम्हें बताई गई। अब इस योग की बुद्धि सुनो, जिससे तुम कर्म के बन्धन से मुक्त हो जाओगे।
श्लोक ४०
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥
इस (योग) में न तो प्रयास का नाश होता है और न ही कोई विपरीत फल प्राप्त होता है। इसका थोड़ा-सा भी पालन बड़े भय से रक्षा करता है।
श्लोक ४१
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥
हे कुरुनन्दन! यहाँ निश्चयात्मक बुद्धि एक ही है, किन्तु अनिश्चयी लोगों की बुद्धियाँ अनेक शाखाओं वाली और अनन्त हैं।
श्लोक ४२
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥
हे पार्थ! अविवेकी लोग, जो वेदों की फूलों जैसी वाणी में रत हैं और कहते हैं कि इससे बढ़कर कुछ नहीं है, ऐसी बातें कहते हैं।
श्लोक ४३
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥
वे कामनाओं में लीन, स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानने वाले लोग, जन्म और कर्म के फल देने वाली अनेक कर्मकाण्डों से युक्त बातें करते हैं, जो भोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति की ओर ले जाती हैं।
श्लोक ४४
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥
जो लोग भोग और ऐश्वर्य में आसक्त हैं और जिनका चित्त उनसे हर लिया गया है, उनकी निश्चयात्मक बुद्धि समाधि में स्थिर नहीं होती।
श्लोक ४५
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥
वेद तीनों गुणों (सत्त्व, रजस, तमस) के विषयों से संबंधित हैं। हे अर्जुन! तुम तीनों गुणों से रहित, द्वन्द्वों से मुक्त, नित्य सत्त्व में स्थित, योग-क्षेम से रहित और आत्मवान बनो।
श्लोक ४६
यावानर्थ उदपाने सर्वतः संनृतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥
जैसे जलाशय में सभी ओर से जल होने पर छोटे जलकुण्ड का कोई प्रयोजन नहीं रहता, वैसे ही वेदों का सारा फल उस ब्राह्मण को प्राप्त हो जाता है जो तत्त्व को जान लेता है।
श्लोक ४७
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। न तो तुम कर्म के फल के हेतु बनो और न ही कर्म न करने में आसक्ति रखो।
श्लोक ४८
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
हे धनंजय! योग में स्थित होकर आसक्ति त्यागकर कर्म करो। सिद्धि और असिद्धि में समान रहना ही योग कहलाता है।
श्लोक ४९
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥
हे धनंजय! बुद्धियोग की तुलना में कर्म बहुत नीचा है। इसलिए बुद्धि में शरण लो। जो फल की इच्छा से कर्म करते हैं, वे कृपण हैं।
श्लोक ५०
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥
बुद्धियुक्त पुरुष इस लोक में पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। इसलिए योग में लग जाओ, योग कर्मों में कुशलता है।
श्लोक ५१
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥
बुद्धियुक्त मनीषी लोग कर्मजन्य फल का त्याग करके जन्म के बन्धन से मुक्त होकर उस अनामय (दुःखरहित) पद को प्राप्त करते हैं।
श्लोक ५२
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥
जब तुम्हारी बुद्धि मोह के कीचड़ को पार कर जाएगी, तब तुम सुने हुए और सुनने योग्य सभी विषयों से विरक्त हो जाओगे।
श्लोक ५३
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥
जब तुम्हारी बुद्धि, जो वेदों की विभिन्न बातों से विचलित हो रही है, समाधि में स्थिर और अचल हो जाएगी, तब तुम योग प्राप्त कर लोगे।
श्लोक ५४
अर्जुन उवाच:
स्थियप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थियधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥
अर्जुन ने कहा: हे केशव! समाधि में स्थित स्थिरप्रज्ञ पुरुष की क्या पहचान है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष क्या बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
श्लोक ५५
श्री भगवानुवाच:
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थियप्रज्ञस्तदोच्यते॥
श्री भगवान ने कहा: हे पार्थ! जब मनुष्य मन में उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं का त्याग देता है और आत्मा में ही आत्मा से संतुष्ट रहता है, तब वह स्थिरप्रज्ञ कहलाता है।
श्लोक ५६
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थियधीर्मुनिरुच्यते॥
जो दुःखों में उद्विग्न नहीं होता, सुखों में स्पृहा से रहित है और राग, भय, क्रोध से मुक्त है, वह स्थिरबुद्धि मुनि कहलाता है।
श्लोक ५७
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
जो सर्वत्र स्नेह से रहित है, जो शुभ-अशुभ को प्राप्त करके न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है।
श्लोक ५८
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
जब यह मनुष्य कछुए की तरह अपनी इन्द्रियों को विषयों से सर्वथा संन्यस्त कर लेता है, तब उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित होती है।
श्लोक ५९
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तति॥
निराहारी देहधारी के लिए विषय तो हट जाते हैं, पर रस (आसक्ति) नहीं हटता। परन्तु परम को देख लेने पर उसका रस भी हट जाता है।
श्लोक ६०
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥
हे कुन्तीपुत्र! प्रयास करने वाले विवेकी पुरुष का मन भी ये चंचल इन्द्रियाँ बलपूर्वक हर लेती हैं।
श्लोक ६१
तानि सर्वं संनम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
उन सभी इन्द्रियों को वश में करके मेरे परायण होकर बैठो। जिसके इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है।
श्लोक ६२
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
विषयों का चिन्तन करने से उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है, आसक्ति से कामना, और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।
श्लोक ६३
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति भ्रम से बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि नष्ट होने से मनुष्य का पतन हो जाता है।
श्लोक ६४
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥
राग और द्वेष से रहित, आत्मा को वश में रखने वाला पुरुष इन्द्रियों द्वारा विषयों का भोग करते हुए भी प्रसन्नता प्राप्त करता है।
श्लोक ६५
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठति॥
प्रसन्नता में उसके सभी दुःखों का नाश हो जाता है और प्रसन्नचित्त पुरुष की बुद्धि शीघ्र स्थिर हो जाती है।
श्लोक ६६
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥
अयुक्त (असंयमी) की बुद्धि नहीं होती, न ही उसमें भावना होती है। भावना रहित को शान्ति नहीं मिलती और अशान्त को सुख कहाँ?
श्लोक ६७
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥
जो मन इन्द्रियों के पीछे चलता है, वह उसकी प्रज्ञा को उसी तरह हर लेता है जैसे वायु जल में नाव को बहा ले जाती है।
श्लोक ६८
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
इसलिए, हे महाबाहो! जिसके इन्द्रियाँ सभी प्रकार से विषयों से निवृत्त हो गई हैं, उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है।
श्लोक ६९
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥
जो सभी प्राणियों के लिए रात्रि है, उसमें संयमी जागता है। और जिसमें प्राणी जागते हैं, वह मुनि के लिए रात्रि है।
श्लोक ७०
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वं
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥
जैसे नदियाँ समुद्र में प्रवेश करती हैं, जो पूर्ण और अचल रहता है, वैसे ही जो पुरुष सभी कामनाओं को अपने में प्रवेश करने देता है, वह शान्ति प्राप्त करता है, न कि कामनाओं का इच्छुक।
श्लोक ७१
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥
जो पुरुष सभी कामनाओं को त्याग देता है, निःस्पृह, ममता और अहंकार से रहित होकर विचरण करता है, वह शान्ति प्राप्त करता है।
श्लोक ७२
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थियास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥
हे पार्थ! यह ब्रह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त करने वाला मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इसमें स्थित रहने वाला ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त करता है।